9 जुलाई 2011

अब के सावन ......

ये बरसातमें शबनममें छुपकर बरसती है शमा ,

शमा की न जलन होती है कम ,

ये सावन ही कहलाता है इश्क का साथी

जो पानीमें आग बरसाता है ...............

बुँदे ठहर जाती है चेहरे पर ,

जैसे जलती शमा पर मोम अटक जाती है ,

ठन्डे पानीमें जलकर वो

याद पियु की दिलाती है .....

अबके सावन यूँ बरस जा कुछ ,

तेरी बूंदोंसे एक पाति लिखूं पियासे ,

गौना करा कर ले जाओ अपने संग ,

बाबुल का अंगना अब रास न आवे .......

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