20 जून 2011

बूंदों का संदेस

मैं बूंद हूँ ...
बादलमें छुपी हुई ....
अरे तुम बेताब हो पर कोई मुझको तो पूछो !!!
मुझे पल दो पल बादलकी बाहोंमें सिमटने दो ....
ये पागल पवनकी चुनर ओढ़ बादलकी गोदमें सोने दो ना !!!
ये इश्क दो पल और फरमाने दो ....
थोडासा सूरजको भी हमें चिढाने दो ना ....
जिस पल हम बिछड़ जायेंगे ....
ये पल बहुत ही भारी गुजरेगा हम सब पर ...
मुझ पर ,बादल पर ,उन रंगों पर जो बादल रंगता है मेरे लिए ,
उन पवनके झोंको पर जिस पर हम सवार है ....
उन समंदर पर जिसने हमें उधार दिया है नदी के लिए ,
फिर पूरा आकाश रोयेगा मेरे बिरहा पर ....
थोड़ी और देर मुझे बादलसे इश्क फरमाने दो ...
थोडा मेरे सैयां बादल की बाहोंमें रहने दो ....
आउंगी मैं बूंद बूंद बरसाने तुमपर ....
मेरे वादे पर यकीं कर लो ....

3 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक बादल के आगोश मे हूं तब तक हूं। फिर पता नहीं क्या हश्र होना है, किसी की प्यास बुझाती हूं या खुद तृषित हो जाती हूं या सागर बन जाती हूं, कौन जानता है।

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  2. बादल की ओट में छिपी रह जाने पर
    अपने हश्र से अनजान ही रही नन्ही बूँद
    धरती पर गिरी,
    तो इक अलग आकृति बना गयी ...

    अच्छी रचना .

    उत्तर देंहटाएं

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