8 जून 2011

तेरा साथ

मेरी प्रिया ,
तुम आज बहुत याद आई ,
आज मुझे एक अनजान जगह पर जाना है ,
वो स्टेशन नया था ......
तुम साथ होती तो एक साथ होता ,
तुम मेरा हाथ थाम लेती ,
तुम वहां किसीसे कुछ भी पूछती लेती ,
किसीसे पता पूछती ,
वहां जाने का रास्ता और रिक्शा भाडा भी जानकर आती ,
और फिर एक नए शहर का नया सफ़र नए अंदाज़में करते हम ....
तुम्हारी नज़रसे दुनिया देखने का मज़ा ही और होता ....
तुम्हारी नज़र जो देख पाती वो मेरी आँखे नहीं देख पाती ,
अलगसी हो तुम ...
तुम्हारा नजरिया भी एक अलग ही है ,
शायद इसी लिए तुम जिंदगीसे भरी भरी लगती हो हरदम ,
और हम खाली खाली ...
तुम जिंदगी को जी लेती हो ,
और हम जिंदगी को कभी कभी घसीटते है ....
बस तुम बहुत याद आई ......बहुत ...
मेरे पास मेरे में समायी हो पर हाथ नहीं साथ नहीं ...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...