3 मई 2011

गुलमहोर

गुलमहोर
शायद इस गर्मीमें मुझे इससे प्यार हो गया ....बचपनसे उसके साये में चली थी ...कूदती मचलती चलती रही थी ...पर आसमांमें देखनेकी आदत ना थी उन चुलबुली राहों पर ....छोटी छोटी तितलियाँ लुभाती थी मुझे बेतहाशा ...बड़ी बड़ी झाड़ियोंमें बिना सांप बिच्छुके डरे बस तितलियोंके पीछे दौड़ना .......
पर हां इस गर्मी में पसीनेसे तर होकर मैं बस थोडा सामान भरा हुआ थैला लेकर सड़क पर गुजर रही थी ...मेरी नज़र सामने एक गुलमहोर के पेड़ पर पड़ी ...उसके ऊपर गुलमहोरके एक नहीं कई गुलदस्ते खिले हुए हँसते हुए नज़र आये ...मेरे कदम कुछ पल के रुक गए ...मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी ....लेकिन फिर मेरे पिताजी के घर में छत पर बैठे हुए मेरी नज़र फिर एक ऐसे ही पेड़ पर ठहर गयी ...सुबह उठकर उससे नज़र से बात करती ...वो बहती हवा के साथ अपनी टहनी झुलाते हुए मेंरा सलाम कुबूल कर लेता .....
एक सोच आई उस वक्त .......
हम ग्लोबल वोर्मींग जैसे मसलो को चर्चा का विषय बनाकर एक वातानुकूलित कमरेमें बहस करते है....पर ये गुलमहोरके खिलने का तो वक्त ही है ये कड़ी धुप ही है ...जितनी कड़ी धुप उतना ही उसका हुस्न निखरता है ....खट्टे स्वादकी उसकी पंखुड़िया कभी कभी रस्ते पर से चुनकर खाने का मजा भी लिया है .....उसके कई पेड़ मेरे घर के पाससे गुजरते रास्तों पर थे वो याद आ गए ......
वैसा ही हमारे बीच रहते कुछ इंसानोंके साथ भी होता है ....वो जिंदगीकी कड़ी धुप जैसी परीक्षा की घडी में भी हमेशा हसते रहते है ...जिंदगी की कड़ी धुपसे वो और खिल जाते है ...हम उनके जैसे बनना जरूर चाहते है पर उन कड़ी धुप को झेलना नहीं चाहते ....
जिंदगीकी गर्मी से कड़ी धुपसे कुछ ऐसे लड़ा जाए ,
कड़ी धुपमें एक हरे भरे पेड़ की टहनी पर गुलमहोर बनकर खिला जाए ....

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