14 मार्च 2011

वो आती थी ...

वो मेरे दर पर आती हर वक्त ,
मुझे सताती हर वक्त ,
मुझे छेड़ छुप जाती हर वक्त ,
मैं उस पर गुस्से ही रहता हर वक्त ....
फिर भी हर दिन की सुबह उसका इंतज़ार लेकर आ जाती ,
फिर भी मेरा दिल खिल जाता उसके जाने के बाद ,
मेरा चेहरा हंस देता उसके छेड़ने के बाद ,
फिर भी उसके सताने का इंतज़ार करता गुस्सा दिखाने के लिए ...
एक दिन ....
एक दिन ....
वो मेरी गली आना भूल गयी ...
मेरी आँखें तड़प गयी उसके दीदार को ,
मेरे कान तड़प गए उसकी शरारत को ,
फिर भी ना आई मेरे लाख बुलाने पर ,
हार कर एक दिन उसके घर गया ....
देखा उसकी मैयत सजी है डोली की जगह ,
वो लम्बे अनजान सफ़र पर चली गयी मुझे छोड़कर ....
काश ...काश ....काश .....
उसकी हयातमें ही समज जाता की बिना उसके जिंदगी क्या होगी ??
अब तो सिर्फ तेरी तस्वीर से ही तड़प दिल की बयां होगी ....

1 टिप्पणी:

  1. खुबसुरत पंक्तियाँ , उनके आने के आहट की, जाने की व इन्तजार की ।
    अति सुन्दर....

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