14 मार्च 2011

जापान ...

ना तो कुछ बताकर आती है ,जब आती है दबे पाँव आती है ,
वो नाच है खौफनाक मौतकी जब वो धरती फाड़कर आती है ......
जलके तरंगो पर सवार होकर हर लहर तबाही को लेकर किनारे आया ,
ये ताकतवर इंसान को सिर्फ बेबस और लाचार बनाकर जाती है ....
एहसास हो गया अब की जो तरक्की के सामान जुटाए थे हमने ,
वही हमारी कब्र की तरह खुलते हुए नज़र आये है .......
हर उंचाई पर ठहरा हुआ वो इंसान पलमें ही जमीं पर आ जाता है ,
जिसे कहते है जलजला कहर बनकर वो धरती को हिलाकर जाता है .....
संभल जा ए आदमी ,अब तो जी और जीने दो की कसम खाले ,
ये दुनिया बनी है जीने के लिए उसे कब्रस्तान होने से बचा ले .......
हर जनम के साथ एक पौधा उगा ले ,हर मृतकी याद में एक पेड़ लगा दे ,
हवाई जहाजमें बेवजह उड़ना छोड़ दे दोस्त ,
सायकलसे अपना दोस्ताना बढा दे .....
पोलीथिनकी बेग में अपनी मौत को मत सजा दोस्त ,
कभी कपडेकी थैली में अपना सामान उठा ले ......
आने वाली मौत को नहीं टाल सकते देर हो चुकी है ,
जिंदगी राह को इस तरह थोड़ी दूर तक लम्बी बना दे ........

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