21 मार्च 2011

ये कहाँ आ गये हम

चाँद के नाम एक और पयगाम ....
कल चाँद बहुत बड़ा था ,
कल चाँदकी चमक भी बहुत थी ....
चाँदके आयने में खुद को देखा ,
दिल खिल गया ,मुझे जैसे हथेली में ही वो मिल गया ...
उसको सिरहाने पर रख मैं मदहोश हो गयी ,
कल फिर गर्म रात में मैं सो गयी ...
सुबह जागी तो घने कोहरे का आलम था ,
ठंडी हवाओंने मुझे कम्बलसे ढका था ,
सोचा कल ये चाँद को ही शरारत सूझी होगी ,
उठाकर मुझे खुद की बाँहों में सोते ही ,
उसने मुझे किसी पहाडीकी वादियोंमें छुपाइ होगी ...
बस ये ही ख़याल आया ...
ये कहाँ आ गए हम ..यूँही साथ साथ चलकर ????

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