17 फ़रवरी 2011

अजनबी

किसी लम्बी सी राह पर दो अजनबी का मिलना ,
एक साथ है ,
दो हाथ है ,
एक ख़ामोशी है ,
दो जुबाँ है ,
एक चाह है ,
फिर भी दो राह है ....
एक चाह होती है ,
फिर भी दोनों की राह बदलती है .....
चलते चलते रुक जाओ ,
अपने सपने को फिर से सोचो ,
शायद सामने वही तो है
जो सपने में पुकारता था ,
जो दिल पर दस्तक देकर छुप जाता था ,
जिसका तुम्हे इंतज़ार था ,
आपका दिल हर पल बेक़रार था ,
ये संयोग है ,
चलो आज उसके भरोसे जिंदगी सौंप दो ,
उसकी ख़ामोशी को पढ़ लो ...

1 टिप्पणी:

  1. चलो आज उसके भरोसे जिंदगी सौंप दो ,
    उसकी ख़ामोशी को पढ़ लो ...
    preeti ji aapke blog ko padhna sukhad hai. apni ye rachna vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per tasweer parichay blog ke link ke saath

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