17 जनवरी 2011

मेरा शहर ...

कभी कभी होता है यूँ भी की हम खुद के घर में कुछ अलग जिंदगी जीते है जो अलग सी होती है ....
ये उत्तरायण भी कुछ ऐसा ही हुआ .... हमारे फ्लेट के कोमन टेरेस पर डीजे सिस्टम पुरे दो दिन तक फुल वोल्यूम पर बजाया गया ....टेरेस के ठीक निचे मेरा घर है ...पुरे घर की दीवारें वायब्रेशन से कांप रही थी ...छत पर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी ...और बहार आवाज इतने डेसिबल पर हाई था वो सहन भी नहीं हो रहा था ...जब बिजली थोड़ी देर जाती तो आशीर्वाद सा लगता ....ये सारा नाटक हमारे फ्लेट के लोगोने नहीं पर उनके किसी मेहमान ने किया था जिसे इधर रहना नहीं था ....और शायद सब नशेमें भी थे ...एक दिन घर पर खूब मेहमान थे तो घर पर मजबूरन रहे ....पर दुसरे दिन .....
मैं परिवार के साथ मेटिनी शो में फिल्म देखने चली गयी ...नो वन किल्ड जेसिका ...अच्छी फिल्म .....लेकिन मज़ा तो थियेटर के बहार निकलने के बाद ही आया .....मेरा शहर वड़ोदरा का वो जिसे ह्रदयस्थल कह सकते है वो चार दरवाजा विस्तार था ....सब दुकाने बंद ...ज्यादा वाहन की आवा जाही नहीं थी ...बहुत थोड़े रिक्शा और कर सड़क पर थे ...बहुत कम लोग हमारी तरह घूम रहे थे ...हरदम धमाधम शहर चैन की सांस ले रहा था ...आराम फरमा रहा था .....थोड़े बहुत दुकान खुले थे बिना ग्राहक के ......वहां पर एक के साथ एक सटे हुए शौपिंग सेंटर बने हुए है ...आज वो भी सुने थे ...तो हम लोग तो जैसे भूलभुलैया में घूमते है वैसे एक गली से दुसरे में निकलते हुए खूब मज़ा करते रहे ...शहर के सुने से गलियारे को भी खूब एन्जॉय करते रहे ......एक बंद कोल्ड्रिंक हाउस जो हमेशा ग्राहकसे भरा रहता है और बंद ओटले पर बैठकर जाते आते लोगो को देखा .....
और पतंग के मांजे से घायल पंछियों के लिए वहां पर की गयी एक सुन्दर जीवदया प्रेमियों की एक व्यवस्था भी देखी ....एक मेडिकल कोलेज के विद्यार्थियों ने मोबाइल हॉस्पिटल को वहां खड़ा रखा था राउंड थे क्लोक .....
कभी कभी तनहाई भी बोल जाती है बहुत कुछ ...
बस मुझे कुछ पल के लिए तनहा कर दो ...
शोर के गलियारेमें निशब्द होकर चले चलो ....
मुझे भी थक कर थोड़ी देर सोने दो ....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...