16 सितंबर 2010

जिंदगी कहाँ तु ???

दौड़ती फिरती उड़ती फिजाओंमें
कुछ इस तरह जैसे खुशबू को तलाश हो फूलकी ....
बारिशकी बुँदे लौट गयी बादलों के पास नाराज़सी
वो आज खिड़की में क्यों नहीं आई ????
हर रंग भरकर वो कुछ ऐसे गुम हो जाती है
हम रह जाते उसकी हँसी में गुम जिंदगी भरी
और जिंदगी खुद हथेली से रेत की तरह सरक जाती है .....

4 टिप्‍पणियां:

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  2. जिंदगी खुद हथेली से रेत की तरह सरक जाती है..... .

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