18 मई 2010

मायका ....

आज हमने घडीकी सुइयां ही निकाल दी ,

ये सोचकर की वक्त यहीं थाम जायेगा ....

आज हर साल की तरह फिर हमें विदा होना है ,

बाबुल के आँगनसे पिया की गली जाना है ....

आज ना मेंहदी रची है हथेलियों पर

आज ना शादी का जोड़ा ही पहना है ,

आज न कोई बारातका भी आना होगा

पर आज हमें फिर एक बार पिया के आँगन जाना होगा ....

कुछ पल हमने गुजार लिए बचपनकी गलियोंसे गुजरकर

पापाकी अलमारीसे सारे पुराने आल्बम निकालकर

सारे बचपनके संगी साथी रिश्ते नातीको उंगलीसे सहला लिया है

आज फिर इन सबको छोड़कर यादोंके हँसी मोड़ पर पियाके घर जाना है .....

बाबुलका आँगन छोड़नेकी कसक फिर वैसी ही बोझिलसी है

पियासे मिलने की कशिशमें भी वैसी ही ताज़गी भी है ...

आज फिर बचपनकी यादें और पिया का प्यार हो गए है आमने सामने

हमें फिर एक को अलविदा कह दूजे के पास जाना है ......

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बेटी चाहे कितनी बड़ी ना हो जाए ये गर्मी की छुट्टीमें अपने मइके जाने दिल तरसता है और फिर जब वापस आना हो अपने घर तो ये एहसास से हर बेटी गुजरती है ...है ना .....????

2 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha Preeti ji yahi k naari ka jeevan hai..wo get yaad aa gaya..baabul ka ye ghar gori kuch din ka thikana hai...

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  2. बेटी चाहे कितनी बड़ी ना हो जाए ये गर्मी की छुट्टीमें अपने मइके जाने दिल तरसता है
    nice ..............emotional

    उत्तर देंहटाएं

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