3 मई 2010

खता एक सजा भी

कुछ कहने को दिल करे और जुबान साथ ना दे

बस बंद पलक आँखों पर से उठने का नाम ना ले ,

दवात कागज़ पर स्याही छोड़ने का इनकार करने लगे

कांपते होठ बस यूँही सिल कर रह जाने लगे ,

कोई कुछ तो बता दे की ये दिलने खता कर दी है

इश्क करनेकी फिर भी इज़हारसे अब क्यों ये डरने लगे ????

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देखो ये कितनी सजा मुझे मिल गयी जिंदगी की ,

काफिर हूँ फिर भी जुबानसे निकले हर अल्फाज़ बंदगी के ......

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अजनबी चेहरे पर ठहर जाती है नज़र

तलाश फिर भी रह जाती है दीलमे कोई अपने की ...

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