4 मार्च 2010

कुछ इश्की मिजाज था ....

वो बादलोंमें नजर आता वो चेहरा ,
वो रिमज़िम बुँदे बारिशकी ,
ठंडी हवाओंके ज़ोके कुछ पयाम लेकर आते थे ,
कौन किसीसे जुदा हुआ कभी ?
ख्यालोंमें अभी भी वो अक्सर बिना मेरी इज़ाज़त ही चले आते है ........
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झूमकर बहती जिंदगी को एक साहिल का इंतज़ार ,
एक छोटीसी कश्ती और सागरकी लहरों का आनाजाना ....
बैठकर देखते रहें आज यूँही किनारे ,
सागरका यूँ सूरजको निगल जाना !!!!!!
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हलकसे निगलते हुए पानी भी सुराही को तराश देता है वो मखमली अंदाज है ,
संगेमरमरभी शर्मोहयासे रूबरू होते कतराते है वो हँसी नजाकत है ,
हूर या परी को तो ना देखा कभी हमने ख्वाबोंमें कभी ,
एक तेरा दीदार हो जाए फिर क्या जन्नतकी जरूरत है !!!!!

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