24 फ़रवरी 2010

कलमने कहा चुपके ...

आज मेरी कलम यूँ बरबस रो पड़ी ...

कहने लगी मुआफ कर दो मुझे

तुम्हे कैसे बताऊँ मैं ?

तुम्हारे जज्बातों को बहला ना पाऊँगी अब मैं ...

तुम कहो जो वो सुन ना पाऊँगी मैं ...

कागज़ को खरोंचना यूँ गंवारा ना होगा मुझे ...

मेरे दिलके ज़ख्मोसे उसे यूँ कुरेद ना पाऊँगी मैं !!!!!

अपनी बेबसी लाचारी को तुम्हे भी ना समजा पाऊँगी मैं !!!!

इंतज़ार करना तुम मेरा यूँही , यहाँ पर ही ...

जब तक लौट ना पाऊं मैं !!!

तनहाईके आलममें फिर खुद को तलाश पाऊं मैं ......

3 टिप्‍पणियां:

  1. तनहाईके आलममें फिर खुद को तलाश पाऊं मैं .nice

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  2. कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है ।

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  3. खूबसूरत अंदाज में बेहतरीन रचना.

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