10 जनवरी 2010

मेरे महबूब ,मेरे दोस्त .....

आज फिर वही सुबह ,

आज वही पुराना मंज़र !!!

चलते चलते रुकते कदम

मूड मूड कर पीछे देखती निगाहें

जाने हो किसीके आने का इंतज़ार बेसब्रीसे ,

फिर भी ऐतबार भी शायद ना आये फिर .....

जिसका हम इंतज़ार कर रहे ,

सब्र का पयमाना छलकाए ,

आँखोंको राहों पर अपलक टिकाये

हर वक्त सोचके जहाँमें यादों को फिर फिरसे सहलाए ,

शमासे उठती लौ में उसके चेहरे को उजागर पाए ,

बुझती शमाके आखरी बूंदको अपनी आँखोंमें छलकाए ,

एक बार मुआफ करदे ...

दस्तक देते जाओ हमारी जिंदगीकी किवाड़ पर

हमें जीने की वजह देते जा ...

मेरे महबूब ,मेरे दोस्त ....

1 टिप्पणी:

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...