12 दिसंबर 2009

ख़ामोशी

खामोशी को कभी पढ़ा है ?

ख़ामोशी को कभी देखा है ?

ख़ामोशी को कभी सुना है ?

ख़ामोशीको कभी साँसोंमें भरा है ?

पढो उसे भूखे पेट बच्चेको सुलानेवाली माँकी निगाहों में ....

देखो उसे अपने जवान बेटेकी लाश

कांधो पर ढोकर जाने वाली बापकी हयातमें .....

सुनो एक परिवारकी भूखको मिटाने एक अबोध लड़की को

एक अधेड़के साथ ब्याहते वक्त उस माँके आंसूओ में ......

साँस डूबने लगेगी जब देखोगे उस माँ को

जो अपनी आंखोंके सामने अपने बच्चेको जिंदगी के लिए

ज़ुजते हुए देख रही हो ........

ख़ामोशी वह जुबान है जिसकी हर भाषामें एक ही अभिव्यक्ति है ...

किसी भी सच या झूठ का दबा हुआ राज़ है ....

कभी इकरारमें छलकती है कभी इनकारमें तब्दील होती है ...

न आवाज़ है न साज़ है

फ़िर भी ये ख़ामोशी दुनिया के हर अल्फाज़ को समेटे है ...

बस खामोश बनकर .....

1 टिप्पणी:

  1. priti ji
    khamoshi ko bahut hi gahre shabd de diye aapne...........bahut hi dhyan se dekhi aur suni hai aapne khamoshi ki aawaz.........rooh tak utarti chali gayi.

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