24 नवंबर 2009

क्या करें ????

बंध लब भी अल्फाज़ कैद नहीं कर पाए ,

जुदा होकर भी तुम्हारी यादोंको जुदा न कर पाए ....

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सजदे करते गए तुम्हारी राहोंमें हर

बस खता कुछ हो गई अनजाने में हमसे ही ,

की आप शायद चाहकर भी

हमारी दुआ कुबूल न कर पाये ......

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तुमसे मिलना ,बातें करना एक सपना हो गया ,

वो दिलबर कल तक था हमारा आज गैर का हो गया .....

3 टिप्‍पणियां:

  1. सजदे करते गए तुम्हारी राहोंमें हर

    बस खता कुछ हो गई अनजाने में हमसे ही ,

    की आप शायद चाहकर भी

    हमारी दुआ कुबूल न कर पाये ..

    चाह कर भी दुआ कबूल ना करना सचमुच गुनाह को इंगित करता है !!

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति है सांड को चारा मिला खुश हुआ !!!

    उत्तर देंहटाएं

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