10 नवंबर 2009

एक चिठ्ठी औरत के नाम ...

आज एक ख़त औरत का ख़ुदके नाम :

प्रिया ,

हाँ ! मैं तुम्हे प्रिया ही कहूँगी ...क्योंकि जब तक मैं ख़ुदकी प्रिया न बनू इस जहाँ की प्रिया कैसे बन पाउंगी ?तुम्हारे जन्म पर माँ के मुख मंडल पर क्या भावः थे ? याद तो नहीं ही होगा पर क्या हो सकते है ये अब जान ही गई होगी ...नहीं ये सब बातें तो पुरानी हो गई सखी ...एक नई बात करें ?

ये दुनिया ढोल पिट रही है औरत स्वावलंबी बननी ही चाहिए ...हँसी आती है ...ये दुनिया हर जगह पैसे के अलावा कुछ सोच नहीं पाती ...पहले तो बेटी को पढाओ ..हाँ अब तो लड़कियां पढ़ लिख रही है ..पर ये हवा शहरों में बह रही है ...गाँव की हवा तो अभी ताजी है पर विचारों की ताजगी कहाँ ? फ़िर शुरू हुआ पैरों पर खड़े होने का सिलसिला ..छोटी बड़ी नौकरी करके आर्थिक स्वावलंबन का मतलब मिला ...अच्छा है ...

पर डियर , क्या हम स्वतन्त्र है ? नहीं दोस्त ...अब तो दोहरी जिम्मेदारी निभाने की ...ऑफिससे आकर पाँव पसर कर चाय पिने की आज़ादी कहीं है ?????किचन की पुकार तो आखरी ऑफिस के घंटे में आती है ...अरे आया को रखा है बच्चे सँभालने को और फ़िर बुढापे में उम्मीदें करेंगे की बेटे बहु सेवा करें ...क्या ये मुमकिन होगा ???

ये भी घिसी हुई कहानी हो चुकी है ...

चल आज एक बात करूँ दोस्त ,

= क्या तुझे आज़ादी है की एक दिन सुबह को दस से बारह बजे के घर के बिजी समय में तू सुस्ताने को किसी अपनी बचपन की सहेली को किसी को बिना कुछ बताये चुप चाप चली जाए ...और फ़िर वापस आए तब ? बस बस ये तुम्हे और मुझे सब पता है ...बिना कुछ कहे कहीं एक दिन भी हम कहीं जाने के लिए आजाद नहीं है ...इत्तिला देनी ही देनी है ...क्या हमारे बच्चे और पति ऐसा नहीं करते ? बस ये हम क्यों नहीं कर सकते ?

= सिर्फ़ एक दिन हम हमारी पसंद की हर चीज़ सुबह से शाम तक के खाने में बनाये जब घर में सभी सदस्य हाज़िर हो फ़िर भी ...एक दिन सास ,ससुर ,पति ,बच्चे कोई नहीं सिर्फ़ मैं और मेरी पसंद .....नहीं ये भी हमने कभी सोचा तक नहीं ? हम ऐसी स्वार्थी कैसे बन सकती है ? क्या एक दिन की ये आज़ादी हमारा स्वार्थ बन गई ? संस्कार सिर्फ़ हमारे लिए ही ??? अगर घर में कहेंगे आज खाना नहीं बनेगा तो होटल से मंगाया जाएगा पर हमारे लिए पति महाशय पका देंगे ? शायद नहीं ....

= कहीं काम से बहार गए ...खूब भूख लगी तो चाय की कितली पर खड़ी होकर अकेले चाय पिने की हिम्मत करेगी ? एक बहुत बढ़िया फ़िल्म लगी है ...घर में बच्चे या पति को साथ आने को मना कर देते है ,सहेली आने से मना करती है , भाई -भाभी सब रिश्तेदार भी मना कर चुके है ..तो अकेले सिनेमा देखने जा पायेगी ???

= मैं घर में सब जिम्मेदारी से थोडी मुक्त हूँ मुझे गाना सिखने का शौक है ....कितने लोग के घर में ४६/४७ साल की महिला को सहर्ष भेजा जाएगा उसका शौक पुरा करने के लिए ....शक के दायरे मैं ये सवाल भी .....

= एक बेटी के बाद कोई संतान नहीं चाहिए ...क्या ये इच्छा सिर्फ़ औरत की हो और इसमे वो सफल हो ????

बस सखी इतना ही कहूँगी पढ़ी हो या अनपढ़ ,शहर की हो या गाँव की औरत अपने लिए एक दिन जीने की आज़ादी पा सकेगी ???

मुझे पता है इस बारेमें महिला ने कभी सोचा भी नहीं होगा ...सिर्फ़ सोच कर ही देखो क्या ये मुमकिन है ???

बस तुम्हारी सखी

एक मानुनी ....

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस रचना में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

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