30 सितम्बर 2009

मजबूरी

सजदा कर दिया सरजमीं पर इश्कमें तुम्हारे ,

बंदगी तहे दिल से करते रहे हम ख्वाहिशोंके पूल बाँध ,

इबादत हमारी फ़िर भी कुबूल नहीं की खुदा ने कैसे ?

शायद हमारी मोहब्बत किस्मतमें अधुरा रहना लिखाकर आई थी .....

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मासूम सी जिंदगी बदल जाती है पशो पशमें वक्त की ,

रेत का टीला भी टूट न पाया तेज आँधियों से ,

एक फौलाद का दिल बर्फ की सिली पर भी ,

देखो पिघलता देखते रहे हम मजबूर होकर ......

2 टिप्पणियाँ:

  1. एक फौलाद का दिल बर्फ की सिली पर भी ,

    देखो पिघलता देखते रहे हम मजबूर होकर ......
    waah kya baat kahi aafrin.isliye di ko koi samjh na paaya,waqt waqt rang badalta hai.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं