17 सितंबर 2009

चलो गरबा जोवा .....

चलो आज हमारे शहर वडोदरा की ही सैर कराती हूँ ...एक छोटी सी जगह है पर एक सुकून सी उसको गले लगाने वालो के लिए ....हम सब जानते है की शनिवार से देवी पूजा का पर्व नवरात्री शुरू हो रहा है ....दुर्गा ,काली, अम्बिका ,वैष्णो देवी और कितने नाम है ...पर जैसे की सब जानते है गुजरात की धरती पर ये गरबा उत्सव के रूप में मनाया जाता है और आज ये गरबा महोत्सव की सैर पर ले चलती हूँ ....

एक छोटा सा छेदवाला मिटटी का घडा ..उसमे एक दीपक प्रगटाकर उसे माँ अम्बा के तस्वीर के सामने रखा जाता है ...इस घडे को गरबा कहते है ...रात को सभी औरत और मर्द इसके इर्द गिर्द गोला बनाकर माँ की स्तुति करते हुए जो गीत गाते है उसे गरबे के नामसे जाना जाता है ...दो एक घंटे तक इस तरह नौ दिन तक आराधना की जाती है ...अंत में आरती होती है और प्रसाद बांटा जाता है ....आज भी गुजरात के छोटे छोटे गाँवमें इसी रूपसे गरबा गाया जाता है ....ये गरबाका प्रारंभिक रूप है ...

लेकिन वर्तमान में ये रूप बदल चुका है ...इसे भी ग्लोबलायिज़शन का रंग चढ़ चुका है ...इसे पुरी तरह कोमर्सिअल कर दिया गया है ...पर फ़िर भी ये गरबा एक जूनून लेकर आता है यहाँके लोगोंके दिलो दिमाग पर ...गणपति उत्सव के तुंरत बाद इसकी तैयारी में युवा जुट जाते है ....यहाँ नवा बाज़ार करके एक खास बाज़ार है जहाँ पर गरबे के लिए खास पोशाक और गहने मिलते है ...लड़कियां हो या औरते यहाँ पर गरबा घुमने के लिए चनिया -चोली और चुनर का परंपरागत पोशाक पहनती है ...और बिल्कुल गांवठी किस्म के गहने पहने जाते है ...लड़के एवं पुरूष कुरता चूड़ीदार पजामा ,या धोती , पगड़ी तक बांधते है .... छोटी सी एकडेढ़ साल की बच्ची से लेकर हर व्यक्ति गरबेमें येही ड्रेस कोड अपनाता है ....बनाव श्रृंगार और ब्यूटी पार्लर वालों की तो निकल पड़ी है .....रोज नया ड्रेस और पुरा माहौल एक रंगों की बारिश सा बन जाता है ...

ये गरबा गाने के लिए भी ग्रुप होते है ...उसके सिंगर्स कई महीनों से नए और प्राचीन गरबोंको सूरों में बांधते हुए नए गरबे गाने की होड़ में लगे रहते है ...जिसका गरबा सबसे सुरीला होता है उस मैदान पर भीड़ गाने वालों की और देखनेवालों की सबसे अधिक जमा होती है ....जिसमे प्रमुख नाम है अतुल पुरोहित और अचल मेहता ...ये लोग भी पॉँच आंकडे में अपना मेहनताना लेते है ...गरबे के स्पोंसरार्स होते है ...वहां पर खाने पिने के भी स्टाल्स लगते है ....रात दस बजे से रात के एक बजे तक ये रात को हम दिन में तब्दील कर देते है ....

ये जो गरबा नृत्य किया जाता है वह स्टेप्स और हिंच कहा जाता है ...उसके स्टेप्स को ताली और बिना ताली के सिर्फ़ एक्शन के साथ सभी खेलने वाले एक ही ले में करते है गरबा गान के साथ साथ ....और एक के अन्दर एक ऐसे कई वर्तुल गोलाकार में गाया जाता है ...अंत में होता है भांगडा और गाड़ी भी ...आज कल ये गरबे बड़े मैदानों में आयोजित होते है ...और बहुत ही देश विदेश तक मशहूर हुए है ...इसमे युनैतेद वे ऑफ़ वडोदरा ,आर्की , अम्बालाल पार्क,मेहसाना नगर ,आदि गरबों में तो एक साथ बीस से चालीस हज़ार तक युवा एक साथ गरबा करते है ....अम्बालाल पार्क का गरबा मेरे घर के ठीक सामने वाले मैदान पर ही होता है ...इस जश्न की मैं हर साल साक्षी बनती रही हूँ ....

वैसे शेरी गरबे यानी की छोटी सोसाइटी या शहर की गलियों के गरबे का भी अपना अलग अंदाज़ होता है ...शहर की सडकों पर भी ऐसे गरबे आयोजित होते है ...जहाँ ड्रेस कोड की पाबन्दी नहीं होती है ....पर ज्यादातर लोग चनिया चोली और कुरता पजामा ही पहनते है ......इसे शेरी गरबा कहते है ...जो प्राचीन गरबों से मिलता जुलता लगता है ...

यहाँ पर छोटे छोटे बच्चों के लिए भी अलग आयोजन का दौर शुरू हुआ है ..जहाँ बिल्कुल छोटे बच्चे जो रात को जग नहीं सकते उनके लिए शाम सात से दस बजे तक ये आयोजन गरबा के मैदान पर होता है ...पता है ऐसा लगता है फ़िर कृष्ण भगवान और गोप ग्वाले और गोपियाँ पधारे है ...ऐसे ही एक मशहूर गरबा अदुकियो ददुकियो का आयोजन मेरे घर के सामने होता है .....

यहाँ मांडवी नाम की जगह है जहाँ पर अम्बा माता का अति प्राचीन मन्दिर है वहां पर शाम आठ बजे से दस बजे तक सिर्फ़ पुरूष ही गरबा करते है ...बिना माइक या ढोल के ...ख़ुद ही गाते है ...वहां औरतों को गरबा करना वर्ज्य है ..यहाँ पर गायकवाड महाराजा ने दो मन्दिर बनवाये है ...एक बहुचाराजी और दूसरा पादरा कसबे के पास रानू गाँव में तुलजा भवानी का मन्दिर ...नवरात्री के दिनों में यहाँ पर बहुत ही भीड़ होती है .....

यहाँ के लोग व्रत अनुष्ठान भी करते है ..नौ दिन तक उपवास और विशेष आराधन और यग्य किए जाते है ...गायत्री माँ के अनुष्ठान होते है ...कई लोग गरबेके घडे का और जवारा का स्थापन करते है ...दसवे दिन उन्हें पुरे सम्मान से विदा करते है ....

भक्ति के रंग के साथ यौवन का उन्माद यानी की विश्व का सबसे लंबा चलने वाला ये त्यौहार नवरात्री ...

हर अच्छी चीज़ के साथ कुछ दूषण आ ही जाते है ...रात को देर तक लड़कियां बेफिक्री से घुमती हुई सिर्फ़ गुजरात में ही नज़र आती है .जो सभी के लिए एक आश्चर्य ही होता है ....जवानी के साथ कुछ जातीय स्वछंदता भी देखी जा सकती है ...उसके दुष्परिणाम भी आते है पर ऐसे कुछ किस्सों के कारण ये महोत्सवको बदनाम नहीं कर सकते क्योंकि ये पुर्णतः भक्ति से भरा होता है ...हमारी परम्पराओं को जिन्दा रखता है ...हमारे गरबे को विश्व के नक्शे पर नाम देता है ...रात को निरंतर तेज गति के नृत्य करने के बाद भी थकन नहीं होती ...दूसरे दिन सभी इतने ही उत्साह में नजर आते है ...ये माँ की भक्ति का ही प्रताप होता है ....

कभी मौका मिले तो इस महा उत्सव को देखने का आनंद जरूर लें ....

केसरियो रंग तने लाग्यो अला गरबा ......

तारा विना श्याम माने एक्लादु लागे ...

4 टिप्‍पणियां:

  1. हे हालो...हालो...जोवा जिए....

    फोटा वगर तो मजा नहीं पड़े ने बेन....बाकि लेख मजानो, हो...

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  2. घूमतो-घूमतो जाये रे आज मारो गरवा घूमतो जाये
    मै भी बहुत खूश क्युकि अब खेलने की बारी आ रही है

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  3. वाह गरबा के बारे के बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने शुक्रिया

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  4. rochak jankari ke sath hi, garave ko lekar apke vichar or chintayen samajh sakte hai, ho sake to photo ke sath garve ke bol bhi likh de.

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