1 सितम्बर 2009

सैलाब

ये मेरी ३०० वी पोस्ट है ....

बस नौ महीने के सफर में मुझे लगता है कितना कुछ छुपा कर रखा था मुझमें और जो ख़तम ही नहीं हो सकता ....

एक छोटी सी तो लकीर थी पानी की ,

और मैंने उसे खरोंच दिया हौले से ....

पानी की लहरें फुट निकली उसमें से ....

और शायद एक सैलाब था आगोशमें मुझमे समाया सा .....

6 टिप्पणियाँ:

  1. सच कहा आपने मन के भावों को जब व्यक्त करने का माध्यम मिल जाये तो वो बह निकलते हैं.....लिखती रहिये....तीनसौ वीं पोस्ट वो भी इतने अल्प समय में ....कमाल है....जैसे ज्वाला मुखी से लावा फूट पड़ा हो...
    नीरज

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  2. ३०० वी पोस्ट की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  3. भावपूर्ण कलात्मक ढंग से एकदम सही कहा आपने....

    ऐसे ही लिखती रहें...सतत सुन्दर लेखन हेतु शुभकामनायें...

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