4 अगस्त 2009

उनसे मिलकर ....

चुपचाप लंबे रस्ते पर हमकदम बनकर चलते रहे एक शाम ,

रुके थोडी सी देर के लिए एक मिलके पत्थर पर बैठे ,

एक शब्द ना उन्होंने कहा था , हम भी चुप्पी साधे चलते रहे थे ,

पर फ़िर भी ये लग रहा शायद बहुत सारी बातें हो गई थी ......

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उनकी दांतमें ऊँगली दबाने की अदा जैसे बातें कर गई ,

उनकी जुकी हुई पलकें शर्मो हयासे हमें कायल कर गई ,

बढ़ते बढ़ते रुक जाते थे जो कदम उनके साथसे मचल गई ,

उनके रुखसार पर आ कर अटक गई जुल्फ हमें घायल कर गई .........

क्या कहें ? क्या ना कहे ? क्या कोई जरूरत लगी उसकी ....

हमारे बीच थी जो खामोशी वही बातें करती रही ,सन्नाटे को चीर गई .........

3 टिप्‍पणियां:

  1. खामोशियों की जुबान क्या खूब पढ़ी आपने ..प्रीती जी..लिखती rahein ...

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  2. waah.........khamoshi ki baat sirf khamoshi hi samajhti hai..........shayad isiliye bina kahe bhi baat hoti hai.

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