17 जुलाई 2009

तस्वीर

बाहें फैलाकर बह रहे थे बादल

शब्दोंके कैमरेमें कैद कर

उनकी एक तस्वीर भेज रही हूँ

इस मौसममें चुपकेसे एक खुबसूरत खता कर रही हूँ ......

हर दिशा मचलकर भूरासा भेस पहनकर

सूरजको समेटकर छुपाकर अपनी पनाहोंमें

एक बिरहनसी अपने आँखोंकी बूंदों से

इस प्यासी धरती पर बेपनाह स्नेह बरसा रही थी .....

लगता है आसमांने भी खुली बाहोंमें

समुन्दरको बादल बनाकर समेटा हो

बिजुरी बनाकर उसकी मांग भरी हो

मेघधनुकी चुनर ओढ़कर गरजकी शहनाई बज रही हो .....

बादलोंकी लकीरोंसे एक तस्वीर

उभरकर आँखोंमें बन आई है

और मुझे मेरे परदेसी पियुकी

फ़िर याद आई है .......

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