3 जून 2009

शादी एक पवित्र रिश्ता

शादी ......!!!
दो अनजान या फ़िर जाने पहचाने व्यक्तियों के बीचके समाज द्वारा जो स्वीकृति की मोहर लगायी जाती है उस रिश्ते को हमने शादी का नाम दिया है ....
एक स्त्री और एक पुरूष वयस्क होते है तब वे एक अपना स्वतन्त्र घोसला या घरौंदा बनाने का ख्वाब देखते है ...शादी का बंधन उन्हें इस बात के लिए सामाजिक स्वीकृति भी देता है ....दुनिया के किसीभी देश में चाहे वह पछात हो या विकसित हर जगह इसे पुरा सम्मान दिया गया है ...
जैसे हम रोटी कपड़ा और मकान और व्यवसाय को जरुरी मानते है वैसे ही जातीय जीवन को भी एक अभिन्न अंग गिनकर ये रिश्ते को बांधना और पुरी तरह तन मन धन से समर्पित होकर निभाना ये हमारी मूलभूत जरुरत मानी गई है .......
फ़िर भी आधुनिक जीवन में ये रिश्ता खोखला क्यों लगता है ?
आर्थिक स्वतंत्रता : पुरूष और नारी दोनों ही आधुनिक दुनिया में आर्थिक रूप से स्वतन्त्र होने लगे है ...कल तक बात ये थी की नारी कम पढ़ी लिखी और आर्थिक रूप से पुर्णतः पुरूष पर निर्भर थी चाहे वह पिता हो या पति ....
वो ख़ुद को कमजोर नहीं समजती ...उसको ये नए पंख मिले है तो वह दूर तक उड़ना चाहती है ...यह बुरी बात तो नहीं पर इस बात का अंहकार भी उसमे पाया जाने लगता है तब प्यार की नींव पर बने इस रिश्ते की नींव हिलने लगती है ....और ये अहम् छोटी बात से शुरू होकर अलगाव तक पहुँच जाता है ...और ताज्जुब की बात है की इसे अब समाज स्वीकार भी करने लगा है ...कानूनन हक़ है ये मैं भी स्वीकार करती हूँ पर शादी एक प्यार और समर्पण का रिश्ता है जहाँ पर दोनों को ही अपने सभी पहलु को एक दुसरे को समर्पित करना होता है वहां पर वह शादी की वेदी पर अहम् को समर्पित नहीं करते और अपने साथ जुड़ी बाकी जिन्दगी के साथ भी खेल जाते है ....
सामाजिक स्वछंदता :जातीय स्वेच्छाचार को बढ़ते देखकर शादी का जो रोमांच होता था वह ख़त्म होता नजर आता है ...शादी से पहले खुलकर मिलने वाले दो व्यक्ति शादी तक तो अपने अच्छे पहलु को ही उजागर करते है ...पर शादी होने के बाद जब २४ घंटे का साथ बन जाता है तब उनके स्वभाव की त्रुटियां भी खुलकर सामने आ जाती है ...इस हाल पर उन्हें लगता है की उन दोनों का एक दुसरे के प्रति प्यार ख़त्म हो गया है ...पर हकीकत ये नहीं होती ...उन्होंने प्यार को बहुत ही छोटे मापदंड पर नापा होता है ...समर्पण को भूलकर ...फ़िर ये रिश्ता खींचता है और ये लोग जी भर के जी नहीं पाते ...जिंदगी कमजोर कड़ी लगती है ....क्या समय और महत्वकांक्षाओं की वेदी पर प्यार की बलि नहीं दे रहे है आज के सुधरे हुए लोग ........हम दुसरो के बारें में जरा भी नहीं सोचते है ...स्वार्थ ही देखते है तब ये रिश्ता ये शादी बेमानी हो जाती है ......
आज कल की परवरिश और अकेलापन जो रस्ते पर ये लोगों को ले जाता है वहां पर बहकना स्वाभाविक लगता है ...हमें किसीका सलाह मशवरा मानने में निचा लगता है ..यहाँ भी अहम् .......

शायद शादी का ये रिश्ता तो सरहद पर रहने वाले जवान की पत्नी को पूछो जिसकी राहों पर आँखे बिछ जाती है ...दूरियों पर भी नजदीकियां बन जाती है ....जहाँ पर एक ख़त सामने वाले के वजूद का साक्षात्कार कराता है ....



ये जिंदगी हमें सिर्फ़ एक बार मिलती है ....उसे नोटों की बलि मत चढाओं .....कुछ तो प्रकृति से सीखो ...क्यों हम प्यार और शादी को पैसे की बलि चढाते है ....अगर हम समजे तो अकेलेपन को दूर करने की चाबी तो हमारे पास है पर इसका सही इस्तेमाल हम जानते हुए भी करना नहीं चाहते ....

2 टिप्‍पणियां:

  1. विवाह जब बराबरी पर कायम होगा पवित्र होने लगेगा।

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  2. aapki ye post samaj ko aaina dikhane ka kaam karti hai....
    शादी से पहले खुलकर मिलने वाले दो व्यक्ति शादी तक तो अपने अच्छे पहलु को ही उजागर करते है ...पर शादी होने के बाद जब २४ घंटे का साथ बन जाता है तब उनके स्वभाव की त्रुटियां भी खुलकर सामने आ जाती है ...इस हाल पर उन्हें लगता है की उन दोनों का एक दुसरे के प्रति प्यार ख़त्म हो गया है ..
    aapki ye panktiya katu satya hai.... mai psychology ka student hun..... maine bhi dekha hai ki talaak me bhi ye factor bahut mahatvapurn role ada karti hai

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