4 जून 2009

आत्मगौरव

आत्मगौरव !!!!

ये शब्द का सहज अर्थ हम क्या समज पाये है ? आज ये छोटा सा सवाल है मेरा ...ये फिलोसोफिकल लगनेवाला ये शब्द हमारी सामाजिक समस्या का कारण है ।

छोटी थी तब टीवी खूब अच्छा लगता था ..तब तो खाली दूरदर्शन ही था ..जब समाचार आते वो खूब चाव से देखती ..मुझे रशिया के राष्ट्रपति हो या फ्रांस के हो ..एक बात आज तक अच्छी लगती है उनकी ...वे अपनी राष्ट्रभाषा की ही प्रवचन में प्रयोग करते है ..चाहे देशमें हो या विदेशमें ..एक अनुवादक उनके भाषण का अनुवाद करता रहता है ...और हमारे यहाँ ????

जैसी भी आती हो अंग्रेजी बोलना हमें बड़ा ही सम्मोहित करता है ...अंग्रेजी बोलने वालो से हम जल्द प्रभावित हो जाते है ....हिन्दी में बोलने वाला हमें "देसी " लगता है ....हमारे पास एक ही जवाब है ...इंग्लिश इज अ ग्लोबल लेंग्वेज और हमें ये आनी ही चाहिए .....हमारी मातृभाषा जो भी हो बच्चा अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ना चाहिए ...आज का बच्चा अपनी माँ से बेजिजक कहता है ..मम्मी सबकी मम्मी जींस -टी शर्ट पहनकर आती है तब आप बिल्कुल गंवार लगती है साड़ी पहनकर .....ये क्या है ????

सिर्फ़ आत्मगौरव का अभाव जो बचपन से हममें ठूंस ठूंस कर भरा जाता है .....हमें हमारे देश से दुसरे देश ज्यादा अच्छे लगते है ...दुसरे देश के लोग ,उनकी भाषा ,रहनसहन , फिल्में सब कुछ ......जब की अब ये हालत है की पाश्चत्य देश हमारी संस्कृति की और झुक रहे है ...और हम अभी वही राग आलाप रहे है ...कब तक ???

आज हमारा समाज जो जाती ,धर्म ,उंच नीच आदि से तो पहले ही बँटा है वह एक नए सिरे से बंट रहा है , बोली के आधार पर ....वर्नाक्यूलर में पढने वाला और अंग्रेजी जानने ,समजने वाला और बोलने वाला ....आपके पास गहरा ज्ञान न हो पर फर्राटेदार अंग्रेजी बोल दी ...आधा काम हो ही गया समज लो ,...जो भाषा बोलचाल की हो और पढने की अलग हो ...बच्चा बचपन से इस दोराहे में उलझ कर रह जाता है ...ऊपर से अच्छे मार्क्स का और टेंशन बढ़ा दिया है हमने ....

हमारा बच्चा अच्छे नंबर लाये तो अच्छा ...अच्छी चित्रकारी या मूर्ति कार बनने के लिए माँ बाप गौरव नहीं लेते ...एक लड़की ऐक्ट्रेस बनना चाहे तो बस हर तरह की पाबन्दी ...उसे टीचर ही बनना है ..हमारे बच्चो की जो विशेषता है उसके लिए हमें आत्मगौरव नहीं है ...

ख़ुद पर भी नहीं ....बाजु वाले ने मर्सिडीज़ ले ली और हमारे पास सिर्फ़ स्कूटर ही है !!!!!लज्जा आती है ...हम ये नहीं समजते की अपने आत्मा की आवाज के विरुध्ध जाकर कितने काले काम भी हो सकते है ये चमचमाती जिंदगी के पीछे ...ऐ सी कमरेमें उनकी रातें आंखोंमें बिना नींद गुजरती होगी , बिना नींद की गोली नींद भी नहीं आती होगी ...जो हमारे पास सहज उपलब्ध है ...बी पी ,डायबिटीस और न जाने कितने रोग की गोलियां उनके टेबल पर खाने की जगह सजी हुई होगी ....पर फ़िर भी हम लोग लघुता ग्रंथि से पीड़ित ही रहते है ...आत्मगौरव का आभाव .......

जापान ,चीन ,जर्मन ,फ्रांस ,रशिया जैसे कई देश आगे है ,विकसित है क्योंकि उन्हें जैसे भी हो अपने देश पर गौरव है , वे अपने देशके विकास के बारे में सोचते है ,उसके लिए अपने ज्ञान का प्रयोग करते है ,उन्हें अपनी भाषा ,लोग ,देश पर गर्व है और आत्मगौरव भी .......उनके विकास में मातृभाषा कभी बाध्य नहीं बनी होगी ...

अगर इंसान को अपने आप पर ही विश्वास न हो तो फ़िर दुनिया में कोई उस पर विश्वास कैसे कर सकता है ???

अपने आप पर विश्वास करो ..जैसे भी है हम अच्छे है ...एक खराबी है तो शायद कई सारी खुबिया भी है हम में ...

ये सोचना शुरू करें .....

और क्या कहें ???आप जो भी कोई ये पढ़ रहें है खूब समजदार है ही ...

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiya lekh likha aapne........yadi itna sab soch lein to baat hi kya ho.......aaj swabhiman ke liye kaun jeeta hai agar itna hi sab sochne lagein to desh na jaane kahan pahunch jaye.

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