13 मार्च 2009

ये हँसी वादियाँ : मसूरी ...!!!

ये मन बहुत चंचल होता है ...जाना था जापान पहुँच गए चीन समज गए ना ...!!!
देहरादून पहुँच कर हम ऋषिकेश, मुनी की रेती और देवप्रयाग तक घूम कर फिर वापस आ गए है अपने अगले पड़ाव पर जाने के लिए ...देहरादून के पहाडों में जाने वाली बसों के अड्डे से हमने मसूरी जाने के लिए बस ली । इस सुंदर शहर देहरादून को छोड़ते हुए हम कब पहाडों के रस्ते पर चल पड़ते है उसका पता ही नहीं चलता .हरी भरी वादियों में बहती हुई ठंडी हवाएं हमारे कानों में जैसे कुछ कहने लग पड़ती है .प्रकृति के गीत गाने लगती है .जिग जाग बनाते हुए सड़क पर गुजर रही बस की खिड़की के बाहर नजारा हरदम बदलता है... कभी दिल को जोरों से धड़का देने वाली खाई की गहराई नजर आती है तो कभी बादलों को चूमते हुए पहाडों की ऊँचाई ... मैदान का दामन छोड़ कर कब हम पहाडों की आगोश में आ जाते है कुछ पता ही नहीं चलता .अगर आप निजी वाहन से जा रहे हो तो रस्ते में एक बड़ा सा सुंदर मन्दिर पड़ता है जहाँ आप थोडी देर रुक कर वादियों से मन ही मन में कुछ संदेश दे सकते हो ......
धीरे धीरे छोटी छोटी बस्तियों को पार करते हुए हमारी बस मसूरी पहुँच ही गई ।ये वृतांत मेरे २००१ के दौरे का है . मेरी कम्पनी में से आबंटित होली डे होम में हम रुके . हमारा कमरा होटल के सबसे ऊपर वाले मजले पर था . खिड़की से परदा हटाते ही बाहर दूर देहरादून वेली नजर आई . रात में जब पूरे देहरादून की बत्तियां रोशन हो चुकी तो ये नजर कुछ ऐसा लग रहा था की चाँद पुरी सितारों की बारात लेकर जमीं पर आ गया था . यादें कितनी सुहानी हुआ करती है ना ? हम सुबह में ही वहां पहुँच चुके थे . फ्रेश हो कर नीचे माल रोड की सड़क पर के बाज़ार में टहलने निकल पड़े . महीना मई का होने के बावजूद यहाँ की सर्दी वडोदरा की दिसम्बर की सर्दी के बराबर थी . इस में आइसक्रीम या सोफ्त्टी खाने का मजा कुछ और ही है . कसमसे बिल्कुल सर्दी नहीं होगी ...
कैमल बेक और मॉल रोड की सड़क की खास विशेषता ये है की एक और ही मकान है और दूसरी और सुंदर और मजबूत रैलिंगें बनी हुई है जहाँ से आप पुरी वेली का नजारा ले सकते हो . एक खास अन्तर पर बैठ के देखने के लिए भी सुचारू व्यवस्था है . हर जगह से दृश्य लगातार बदलते नज़र आयेंगे ..बड़ा साफ सुथरा ,ध्वनि और वातावरण के और प्रदुषण से मुक्त एक सुंदर खामोशी का एक अलग ही अंदाज़ देखा गया ...महसूस किया गया ...कभी साफ सुथरी दिखती पहाड़ की वादी पल भर में ही जैसे बादलों की चुनर से अपना चेहरा छुपा लेती है । अभी तेज चमकती धुप होती है तो दोपहर बाद जोरदार बारिश भी हो सकती है . पहाडों के वातावरण की ये तासीर आप सभी जगह पर महसूस कर सकते हो ...हो सके तो बड़ी सुबह ही घूमने निकल जाओ और दोपहर तक वापस भी आ जाओ ...
दूसरे दिन हम साइकिल रिक्शा में बैठ कर मुनिसिपल गार्डन गए ।तकरीबन दो तीन किलो मीटर की दूरी पर यह सुंदर उद्यान है . जिसमे एक ग्लास हाऊस है . सुंदर पेड़ पौधे लगे है . बोटिंग की भी सुविधा मौजूद है .लेकिन सबसे रुचिकर तो यहाँ तक पहुँचने का रास्ता ही है .बस्ती पीछे छुट जाती है . इक्के दुक्के प्राइवेट बंगलो ही दिखाई देते है .होती है सिर्फ़ हरी भरी वादी और उसकी बोलती हुई खामोशी ...शाम एक फिर टहलते हुए गुजारी ...मकानों की बनावट गौर करने लायक है .पहाडों की ढलान पर ऊपर से नीचे तक बने मकान बहुत सुंदर लगते है .जिग जाग सडकों पर गुजर रहे वाहन यहाँ से खिलोनोके समान छोटे दिखाई देते है .....
यहाँ पर मुख्य राज्य परिवहन के बस अड्डे से दो छोटे प्रवास की सुविधा है । एक कम्प्टी फाल के लिए है . दिन में दो बार जा सकते है . सुबह में आठ बजे जो दोपहर तक वापस ले आती है . दूसरी दोपहर में चलती है जो शाम को वापस ले आती है . हम सुबह में ही चल दिए .मसूरी से तकरीबन १५ किलोमीटर की दूरी पर और समुद्र की सतह से ४५०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित ये जल प्रपात हम देखने के लिए चलते है .मसूरी तक आता हुआ नजारा यहाँ कुछ अपनी तासीर बदल लेता है . इस चकराता मार्ग पर पहाड़ थोड़े बड़े होने लगते है और पेड़ थोड़े कम .पहाड़ की चोटी से छलांग लगाकर एक जरना सीधे नीचे गिर रहा है ...यही है कम्प्टी फाल .काफी नीचे तक चल कर जाना पड़ता है .अच्छी खासी पैरों की कसरत हो जाती है . नीचे एक बड़ा सा तालाब बन जाता है और नीचे जाकर फिर वह यमुना नदी में विलीन हो जाता है . नहाने के शौकीन लोग यहाँ ये शौक भी फरमाते है . किराये पर स्वीमिंग के कपडे मिल जाते है ॥अब ऊपर चढ़ते हुए समज आती है कि हम कितना नीचे गए थे जब साँसे फूलने लगती है ..ब्रावो आगे कदम बढाओ .....
बेक टू पवेलियन मसूरी ...शाम को माल रोड के केबल कार में बैठ कर मसूरी कि सबसे ऊँची जगह गन हिल पहुंचे ...चारों दिशाओं से मसूरी का विहंगावलोकन किया . ये हँसी वादियाँ ये खुला आसमान ...आ गए हम कहाँ ?....दूसरी सुबह उसी परिवहन कि बस से हम जा रहे है एक कम जाना माना पर अलौकिक सौंदर्य कि मिसाल धनौलती.मसूरी से २५ किलोमीटर पर स्थित इस जगह से हमें हिमालय क्या चीज है उस चीज का सही मायने में परिचय होता है . सब कुछ मानों कि विशाल हुआ चला जाता है चाहे वो पहाड़ हो या गहरी खाई या पेड़ ....हर मोड़ पर धड़कनें तेज होने लगती है .यहाँ मौसम की सबसे पहली बर्फ पड़ती है . सेब के बागान है .बिल्कुल शांत फिर भी रमणीय ,बिल्कुल भीड़ भाड़ नहीं ...नितांत सौंदर्य की बौछार ..निजी वाहन में यहाँ पर आकर दो तीन दिन रुक सकते है ...यहाँ से १० किलोमीटर दूर एक और स्थान है . सुर खंडा देवी का मन्दिर . पहाडी पर स्थित है . तीन किलोमीटर पैदल चलकर जा सकते है . घोडे भी उपलब्ध होते है . चलो वर्जिश का एक और मौका मिला .चोटी पर पहुँच कर एक और सुंदर नजारा देखिये . यहाँ से बर्फ से ढकी बन्दर पूंछ जगह साफ दिख जाती है अगर वातावरण साफ हो ..हम गए तो बादल हमें छू कर जा रहे थे और ऊपर तो हम ऊपर थे और बादल नीचे थे ...सोचो ..सोचो ज़रा ...बादल की बूंदों की ठंडक हमारे गालों को सहला कर भाग रही थी ..लेकिन जब नीचे पहुंचे तो वातावरण एकदम साफ ....वापसी में जोरों की बारिश हो रही थी .धीरे धीरे चलती हुई हमारी बस मसूरी की तरफ़ बढ़ रही थी . प्रकृति का ये अनुपम सौंदर्य आँखों में समाकर हम पहुंचे मसूरी जील ..एक मनोरम स्थान . बोटिंग की सुविधा है . सुंदर पिकनिक स्पॉट है .यहाँ के गर्म कपड़े बड़े ही स्टाइलिश होते है .यहाँ बोर्डिंग स्कूल भी बहुत है . होटल्स की तो भर मार है .केमरेमें कैद करके जो ख़ूबसूरत पल में लायी थी आज फिर आपके साथ एक बार फिर सहला रही हूँ ........हम कितने प्रदुषण युक्त वातावरण में रहते है , कितनी ज़हरीली सांसे लेते है ,और प्रकृति ने हमारे लिए बनायी हुई इस दुनिया की विकास के नाम पर हमने क्या दुर्गति की है उस भूल को आप महसूस कर सकते हो धनौलती में ....कम जानी पहचानी होने के बावजूद दिल में बस गई है ....

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत ही अच्छे तरीके से अपना संस्मरण लिखा है ...वहां का संजीव चित्रण किया ...बहुत अच्छा लगा
    मेरा भी मन करता है की मैं भी यहाँ कभी घूमने जून ...देखों कब घूम पाता हूँ

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  2. main bhi gayi thi teen saal pahle masoori...aapne sab kuch yaad dila diya.

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  3. अच्‍छा वर्णन ... कुछ पिक्‍चर्स भी होते तो सुदर लगता यह पोस्‍ट।

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