5 फ़रवरी 2009

ऋषिकेश : २ (मुनि की रेती )






चलो दोस्तो आज हम ऋषिकेश की मुख्य सड़क पर अब आ गए है और हमारा अगला पड़ाव होगा मुनीकी रेती ॥

यहाँ से हमे डीजल से चलने वाले ऑटोरिक्शा बड़े आराम से मिल जाते है जो पांच रुपये प्रति व्यक्ति किराया लेकर हमे अपने गन्तव्य स्थान की ओर ले जाते है ।आप पहले लक्ष्मण जुला और फ़िर रामज़ुला या इससे विपरीत विकल्प ले सकते है . अब आप दिल को थाम लीजिये और आँखों में गंगा एवं हिमालय के अप्रतिम सौंदर्य को भरने के लिए तैयार हो जाओ .रास्ता अभी एकदम से ऊंचाई तो नहीं पकड़ता दिखता है पर फिरभी हिमालय के साम्राज्य में आप अपना पहला कदम बढ़ा रहें हैं . उसकी हसीं वादियाँ आपको मंत्रमुग्ध कर देगी ...


हम सीधे लक्ष्मण जुला ही पहुचते है ।वहां उतरकर आप अपने आपको सुंदर पहाड़ों से घिरे हुए पाओगे .रिक्शा छोड़कर हम रस्ते पर चल देते है .बीचमे एक बड़ी हनुमानजी की मूर्ति आती है और पीछे भव्य शिवमंदिर है . दर्शन करते हुए हम आगे चलते है .आजुबाजू कतारों में दुकाने लगी हुई है .पहाड़ के चढ़ते उतरते रस्ते पर आगे बढ़ते हुए हम पहुँच जाते है लक्ष्मण जुला के एक छोर पर .दिल फ़िर थाम लो नीचे हिमालय पुत्री गंगा का चुलबुला अठखेलियाँ करता ये नए रूप का नज़ारा देखो .कहते है ये पूल गंगा नदी से १५० फ़ीट की ऊंचाई पर बना हुआ है [मैंने मापने की कोशिश नहीं की है !!].ब्लू ॥हेवन ली ब्लू ...बस अब निहारते ही रहो .पूल पर चलने से वह हिलता रहता है और इसीलिये शायद इसका नाम लक्ष्मण जुला है .बराबर मध्य में जाकर तनिक ठहर जाइये . चारो दिशा में एक बार घूम कर देखिये .अपनी आंखों को एक पल के लिए मुंद के ठंडी हवाओं की ताज़गी को अपने अन्दर भर लीजिये .हौले के आंखें खोलो और हिमालय के साम्राज्य के रूबरू होने के इस जश्न में शामिल हो जाओ. ये लिखते हुए भी मैं अभी अपने आप को वहां पर ही महसूस कर रही हूँ ...

यहाँ बन्दर बहुत है .एक शौक़ीन बन्दर तो आइस क्रीम खाते हुए भी देखा गया .आते जाते लोग कुछ न कुछ देते रहते है .पूल के दुसरे छौर पर विशाल मन्दिर खड़े है . बायीं और के चौदह मंजील वाले मन्दिर में आपको भारत देश के सभी भगवान के दर्शन हो जायेंगे . एक बार ये वर्जिश कर लो और ऊपर जाकर गंगा को भी निहारों . आस पास के मन्दिर में दर्शन करते हुए यहाँ से बने सीधे रस्ते पर ही रामज़ुला जाने के लिए पैदल ही चल पड़ते है .गंगाकी गूंज की ध्वनि हमारे कानों में पड़ती रहती है . रस्ते के दोनों तरफ़ आमके बगीचे है .सीधे पहुँच जाते है हम रामज़ुला के पास बाबा काली कमली वाले के आश्रम के पास...

फ़िर वही मन्दिर की कतारें ॥वहां लगभग एक से डेढ़ फ़ीट की सीधी चोटीवाले दो महाशय ऊँची कुर्सी पर बैठे घंटी बजाते हुए नज़र आते है ।शरीर पर सफ़ेद धोती और चेहरे पर जोकर नुमा मेक अप .cool ads का ये नवीनतम तरीका है यहाँ की विख्यात चोटी वाला रेस्तोरा का .भूख लगी हो तो थोड़ा नाश्ता करके आगे बढ़ जाते है .अब शुरू होता है गंगाके किनारे से लगा हुआ रास्ता .जहाँ पर एक से बढ़कर एक भव्य मंदिरों की शृंखला है और विशाल घाट . साफ सीढियोंवाले इस घाट पर आप गंगा स्नानका आनंद ले लीजिये .यहाँ भी ज्यादा भिड़ भाड़ नहीं है ....

आगे चलकर आता है गीता भवन एक भव्य मन्दिर परिसर । अन्दर जाकर परिभ्रमण करने पर अवश्य आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है .यहाँ अगर आप कुछ दिन ठहरना चाहते हो तो इसका इंतजाम भी है .एडवांस बुकिंग होती है .यहाँ पर बारह बजने से पहले पहुँच जाओ तो सिर्फ़ दस रूपये में शुद्ध शाकाहारी ,सात्विक ,कम मसालेवाला फ़िर भी स्वादिष्ट खाने की थाली मिलाती है . परमार्थ निकेतन बाजु में ही है. उसे में आश्रम नहीं पर एक शांत आध्यात्मिक अलौकिक अनुभव ही कहूँगी .कितनी पावन और शांत जगह है ये .एक सुंदर सीढियों वाला साफ सुथरा घाट .गंगा के प्रवाह के अन्दर बनी शिवजी की विशाल भव्य प्रतिमा .यहाँ पर कुछ घंटों तक बैठ कर आप थोड़ी उछल कूद करती, अंगडाई लेती शरारती गंगा नदी से मूक वार्तालाप भी कर सकते है ....

रिवर राफ्टिंग के खेल प्रेमिओं की नौकाएँ भी आपको लहरों पर उछलती नज़र आएगी ।आप अगर ये शौक रखते है तो इधरसे आपको पन्द्रह बीस मिल की दूरी पर जीप में ले जाते है जहाँ से रिवर राफ्टिंग करते हुए लौटा जा सकता है . बहुत सारे विदेशी लोग यहाँ पर योग विद्या के लिए आते है और शान्ति से यहाँ ठहरते भी है .यहाँ से रामज़ुला लौट आओ और या तो नौका विहार का आनंद लेते हुए सामने के घाट पर जाओ या फिर पैदल रामज़ुला पर चलते हुए . वहां पर गीता प्रेस गोरखपुर की दूकान भी है और पुरा अच्छा बाज़ार भी नौका विहार के दौरान मध्य में गंगा के निर्मल जल को छूने का एहसास अवर्णनीय है .हाँ एक और बात काली कमली वाले बाबा के आश्रम के नजदीक से जीप के जरिये नीलकंठ महादेव के मन्दिर जा सकते है जो बारह किलो मीटर की दूरी पर स्थित है , वैसे हम लोग वहां नहीं जा पाए थे किंतु वहां का महात्म्य भी अधिक है ....

जब हम यहाँ से वापस चलते है तो हमारी आत्मा जैसे इधर ही ठहर जाती है और शरीर ऋषिकेश के और गति करता है .हिमालय और गंगा के इस सफर को जारी रखते हुए अगली बार आपको मैं ले चलूंगी एक सीप में छुपे हुए मोतीके पास . बस थोड़ा और इन्तजार .........

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