9 फ़रवरी 2009

चाहत ...बस एक बार हो जाए .....



सहरसे शाम तक मशरूफीका आलम था ,

शाम से रात तक खुशफहमी का आलम था ,

रात जवां होते ही अंधेरेने कुछ उजागर किया ,

तब समज पाया की इस जिंदगी में सिर्फ़ तन्हाई का आलम था .....

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किसीकी चाहतमें फ़ना होना एक गुनाह है ,

किसीकी चाहतको ठुकराना एक गुनाह है ,

किसी की चाहत को चाहना एक गुनाह है ,

किसीकी चाहत में चुप रहना भी गुनाह है ....

तो ....

चाहत जो गुनाह है तो उसे खुदा क्यों समजा ?

चाहत जो फ़ना हो जाना है तो उसे उम्र क्यों समजा ?

चाहत जो बंदगी है तो उसके धनीको काफिर क्यों समजा ?

चाहत जो जिंदगी है तो उसे उसे आखरी मकाम क्यों समजे ???

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3 टिप्‍पणियां:

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