24 अप्रैल 2014

टाट का पैबंद

इब्तदा से इंतेहा तक का एक सफर ,
एक सफर में एक हमसफ़र ,
एक मैं और एक मेरा साया  … 
दिन भर नंगे पैर चलता रहा था मेरे साथ ,
शाम होते है सो गया वो 
अँधेरे के दुशाले को लपेटकर  … 
अब  मैं तनहा तनहा ,
आकाश में चाँद और सितारों की भीड़ में
घिरा घिरा सा ,घुटन को लिए दबाये भीतर ,
मेरी तनहाई को अमूमन बिखेरने के लिए ,
तैयार थे एक बडीसी तश्तरी हाथ में लिए ,
उसमे सपनोकी सुनमहोरें सजी थी ,
सब मेरे लिए ही थी ऐसे भी कहा रातने ,
मेरे कानोमे हवाकी तरंग पर गुनगुनाते  … 
मैं चुपचाप ख़ामोशी से इंतज़ार करता रहा ,
परछाईं के जागने का ,
खुद पर एक टाट का पैबंद लगाकर  …… 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - रे मुसाफ़िर चलता ही जा पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. उजाले के साथ जागेगी परछाई भी।

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