11 नवंबर 2011

कांपती सिलवटोंमें

कांपती सिलवटोंमें सिमटने लगी है रातें ,
ठंडी हवाएं दस्तक दे रही है तेरे आने की .....
बस थपथपाती है तू और हम कम्बलमें छुप जाते है ....
और ये सूरज भी कितना अलसा जाता है आजकल ,
वो भी दिन ब दिन रोज के रोज अब देरसे आता है .....
जब आँखें खुलती है सुबह तो पता चलता है
आज हर काममें थोड़ी देर का होना लाज़मी है ....
पर ये लम्बी होती नींदकी सलवटे
दे गयी मुस्कराहट मुझे एक
क्योंकि आँचलके साये तले
एक खुबसूरत लम्हा था तुम्हारी और मेरी गुफ्तगू का
जो चल रही थी उन लम्हों के दरम्याँ...........

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