20 अक्तूबर 2011

किसकी तलाश है ????

मुद्दतें गुजर गयी 
एक शाम सुकूनकी देखी थी ,
गहरी ख़ामोशीको ओढ़ 
मैं छतको ताककर सोई थी .....
न गर्दिश थी न रंजो गम कोई ,
बस चुपचाप तकती मेरी दो आँखें 
एक ख्याल ....एक नर्म हंसी ...
सब कुछ तो है पर फिर भी कुछ नहीं पास है ,
न जाने जिंदगी को अब फिर न जाने किसकी तलाश है ????

3 टिप्‍पणियां:

  1. सब कुछ तो है पर फिर भी कुछ नहीं पास है ,
    न जाने जिंदगी को अब फिर न जाने किसकी तलाश है ????

    ....बहुत संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति..

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  2. वाह ! यह जिन्दगी ........कैसा फलसफा है इसका ...!

    उत्तर देंहटाएं

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