21 सितंबर 2011

खिड़की का कांच

मेरे घरकी एक खिड़की का कांच आज टूट गया ,
कोई बहती हवा का झोका बिन पूछे आ गया ....
लिख कर लाया था वो मेरे वतनका एक पैगाम ,
चल एक बार फिर वतन को हो आये .....
आती हवाओंने दिया है न्यौता वतनकी सफरका 
दीवालीकी खुशबू फिर गूंज रही है जहनके जहानोमे ......

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  2. वाह ....बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

    उत्तर देंहटाएं

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