30 अगस्त 2011

ना जाने मुझे ....



मेरी मंजिल सामने है ,


पर पैर रुक से गए है ,


अब लगता है यूँ जैसे ,


मंजिलसे ज्यादा सुहाना तो वो सफ़र था ....


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उसके आने का इंतज़ार करते


नज़र ठहर जाती है दरवाजे पर ,


आते उनके नज़र बस


निगाहें क्यों झुक जाती है ????


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कभी कुछ बिन मांगे दुआ सा मिल गया ,


एक अजनबी शहरमें कोई जैसे पहचानासा मिल गया .....


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आज पता नहीं ये कलम बेवफाई कर रही है मुझसे ,


दिल सोचता है कुछ और और कुछ और ही सफे पर लिख रही है !!!!!!

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