18 जून 2011

ये ज्यादा अच्छा लगेगा ...

आज वो खामोश क्यों है ???
कितना पुकारा ...कोई जवाब नहीं ....
एक उदास नज़र ....
जिसमे ना कोई शिकवा ना गिला ....
याद आ गयी वो पुरानी शिखा ...
जो हसती रहती थी हरदम ....
चेहरे पर मुस्कान ओढ़कर आती थी ....
हँसी के गुलदस्ते देकर जाती थी ....
मन खिला खिला रहे वो खुशबू देकर जाती थी .....
आज मैं ढूंढ रहा हूँ वो शिखा .....
क्या इलाज़ होगा उसकी खोई मुस्कराहट ढूँढने का ???
बस वही जो आज तक उससे पाया है तुमने ....
उसे कुछ तो लौटाने की कोशिश तो करो ....
वो हँसी के गुलदस्ते तुम सजाने की कोशिश तो करो ...
उसे भी कभी ख्वाहिश रही होगी खिले हुए से मनसे बिखरती खुशबूकी .....
बस सुख पाना अच्छा लगा हरदम ....
अब सुख देकर भी देखो ....
ये ज्यादा अच्छा लगेगा .....
वो शिखा को वापस लेकर आओ ....

1 टिप्पणी:

  1. गम की अंधेरी रात में दिल को ना बेकरार कर।
    सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर।

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