9 मई 2011

वो चुपकेसे ......

एक कोनेमें छुपकर पड़ी थी ,
दीवारोंसे सटकर अकेली ,
उसे संभाला दोनों हाथोसे ,पसवारा,
पोंछे उसके आंसू सूखे हुए धुंधले से ....
रेशमसी देह पर चमकते लब्ज़ थे ,
उसकी जिंदगीका पन्ना एक एक करके पलटना ,
जैसे हर पन्ने पर एक नयी बहार नया नज़ारा लिए थी ,
एक कोनेमें जैसे एक रौशनी छुपकर बैठी थी सालोंसे ,
रोशन करते गए मेरे जहनको एक एक पन्ने उसके ,
बस पहले सफे पर प्यार हुआ ,औरों पर बेक़रार हुआ ....
और फिर वो भी चुपके से मेरी जिंदगीमें शामिल थी ......
वो क्या थी क्या बताऊँ ????
एक जिंदगी जो किताबका रूप धरे बैठी थी धुलसे लिपटी हुई ......

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