31 अक्तूबर 2010

दीवाली का तोहफा ....

रेक्स यानी राही सुबह से देख रहा था .....खुशबू कलसे अलमारी की सफाई कर रही है ...कुछ किताबें कुछ फोटो बार बार देख रही है ..फिर कहीं खो जाती है ....दस बजे खुशबू रोज की तरह टाइम स्क्वेर के ऑफिस में जाने को निकल गयी ....रेक्स घर पर रहा ...शाम की शिफ्ट रिक्वेस्ट करके ले ली ...वो अलमारी टटोली ...वो किताबें ख़त फोटो सभी देखा ...........
फिर निकल गया अपनी कार में ......
दो टिकेट्स ......जयपुर .....
शाम को रेक्स तो ड्यूटी पर चला गया ...कुरिअर आया ...खुशबूने एन्वेलेप खोला ...दो टिकट इंडिया जयपुर ....अपनी और रेहानकी .........सपना सा लगा और खुश भी हुई ....शाम को पॉँच बजे रेक्स का फोन आया ...उसे आज रात को ही ड्यूटी परसे सीधे ही एक कोंफरंस के लिए पेरिस रवाना होना पड़ेगा .....उसने बैग पेक करके ड्राइवर के साथ ऑफिस भिजवा दी...खुद के पेकिंग भी शुरू की ...इंडिया जाने में सिर्फ दो दिन बचे थे ...रेक्स तो पॉँच दिन बाद आने वाला था ....उसने ही टिकट बुक करवाई थी ...इस लिए उसे तो सब पता था .....खुशबू अपने बेटे रेहान को लेकर रवाना हो गयी ....
पुरे दस साल के बाद वो भारत लौटी थी ...रेक्ससे शादी मा बाप को पसंद नहीं थी ...रिश्ता तोड़ लिया था ....ना फोन ना ख़त ...पता नहीं अब बुलाएँगे या नहीं ...पर एक बार देख लुंगी तो तसल्ली हो जाएगी ....रेक्स एक अनाथ था बस उसका यही कसूर था .....प्यार के लिए उसने सब कुछ छोड़ दिया था ...सब विमान यात्रा के दौरान ताज़ा हो गया ......जयपुर वो अपने घर में पहुंची ....वहां पर अब कोई और रह रहा था ...उसे ठेस लगी ...उसने गली में दुसरे पहचानवाले से पूछा अपने फेमिली के बारे में ...तो एक बुजुर्ग ने कहा वो लोग अब पुराने शहर की एक छोटी सी गलीमें रहते है ...सारी दौलत चली गयी ...उसके बापू रिक्शा चलाते है और मा दूसरोके बर्तन साफ़ करती है ...भाई तो आवारा होकर कबका जा चूका ....खुशबू रो पड़ी ...उसने पता लिया और चल दी .......
उस गली उस नुक्कड़ पर ...आज रिक्शा घर पर थी ...सामने टूटी चार पाई पर उसके पिताजी सोए हुए थे ...बीमार थे ...उसने दस्तक दी .....मा बाहर आई ....पुराने खुमार और खूबसूरती अब गरीबी के चोले में दफन हो चुकी थी ...बालों की सफेदी कुछ जल्द ही आ गयी थी ....
मा ...खुशबूने आवाज लगाईं ......
पिताजी खटिया से उठ खड़े हुए ......मेरी तिब्बो ( उसका प्यार का नाम )
मा दौड़कर लिपट गयी ......
मा , बेटी पराया धन है पर आपने मुझे इतना पराया कर दिया ....??????
रेहान सब देख रहा था दरवाजे पर खड़ा खड़ा ...उसे खुशबू ने अन्दर बुलाया ...अपने पिताजी के हाथ में उसका हाथ दिया ...पिताजी ये आपका नाती ...रेहान .....ये तो सूद था ...मूल से भी प्यारा ........तीसरे दिन दीवाली थी ....ये दीवाली इन तीन रिश्तो की असली दीवाली हो चुकी थी ......दीवाली की सुबहमें एक टेक्सी रुकी वहां ....खुशबू ने देखा उसमे से रेक्स उतरा .....बड़ा ही खुश ........उसने सबको पहने कपडे में ही उधर से उठाया ....
जयपुरमें उनकी पुरानी हवेलीके पास गाडी रोकी ....उसकी चाबी अपने ससुर समशेरसिंह को दे दी .....और कागजात भी .....समशेरसिंह क्या कहते ??????कुछ बाकी नहीं रखा था इस दामादने जो बेटेसे भी बढ़कर साबित हुआ .......
खुशबू रेक्सको जानती थी ....उसके चेहरे पर गम का साया ना आने देगा कभी ये शादी के वक्त किया हुआ वादा उसने आज पूरी तरह निभाया था .......
रेक्सने हँसते हुए ससुरसे कहा ...देखो पिताजी आपको मेरे क़र्ज़ तो चुकाना ही पड़ेगा ...दामाद हूँ छोडूंगा नहीं ...आपका तो मैंने शादी का खर्च और दहेज़ भी बचाया है ...वो अब वसूल करने आया हूँ ....बस मेरे मा बाप नहीं है ....उन्हें देखा भी नहीं ...आज आपकी जिंदगी में मुझे दामाद नहीं पर बेटा बना लीजिये ....मुझे दीवाली का तोहफा दे दीजिये .....
समशेरसिंह ने उसे गले लगा लिया ....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...