23 जुलाई 2009

बुँदे ...

घने बादलों के पार से कुछ उम्मीद दिखाई दे रही थी ,

मैं सोचता रहा क्यों पास नहीं आ रही ?

बैठे बैठे सोचता रहूँ तो क्या खाक पास आएगी ,

बस कदम बढ़ा लूँगा उसकी ओर तो ही वो करीब दिखाई देगी ...

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आज पत्तो पर सोयी कुछ बारिशकी बुँदे मिल गई ,

हथेली पर सजा कर उसमे मेघ धनु ढूंढ़ना चाहा ,

बारिश की वह चंचल बुँदे हंसकर फिसल गई ,

मेरे चेहरे पर एक मुस्कान का मेघ धनु छोड़ गयी.....

2 टिप्पणियाँ:

  1. बारिश की वह चंचल बुँदे हंसकर फिसल गई ,

    मेरे चेहरे पर एक मुस्कान का मेघ धनु छोड़ गयी.....

    waah kya baat hai,ek bond muskan hame bhi mil gayi,sunder.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं