11 जुलाई 2009

कागज़ की नाव

पुराने छातेके छेदसे कुछ बारिश हो रही थी ,
मैंने उस छोटी बारिशमें भीग रही थी ...
अपनी मशरूफ जिंदगीमें कुछ ऐसे छेद बना दो ,
पल दो पल मेरे लिए निकालकर मेरी जिंदगी भीगा दो ....
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बादामी आँखोंका समुन्दरमें हिचकोले लेकर लहरे झूम रही ,
अपने प्रियतम बादलकी बूंदोंको घूंट घूंट कर पी रही ,
आज इस आँखोंके समुन्दर को कुछ सिमटा कर झील बना दी
और उसमे अपने सपनोके कागज़ की नाव बनाकर तैरा दी ......

1 टिप्पणी:

  1. अपनी मशरूफ जिंदगीमें कुछ ऐसे छेद बना दो ,
    पल दो पल मेरे लिए निकालकर मेरी जिंदगी भीगा दो ....
    waah bahut hi badhiya.

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