12 जुलाई 2009

आया मौसम खिला खुला सा

छींटाकशी करके आपकी हँसी वादियों को गूंजसे भरती है ,

पास न होते हुए भी दुरियोंके अहेसास ख़त्म कर देती है ,

कल खुली खिड़की के पास यूँही खड़े रह कर

एक भीगी सड़क पर नज़रें यूँ फिसल रही थी ....

अनजानेमें वह आपके आशियाँ के रास्ते पर चल रही थी ,

आपकी नज़र नहीं पड़ी अपनी मस्तीमें भीग रहे थे

नज़र हमारी कुचली गई आपकी एडियोंके तले

भीगे चेहरे पर उलझी जुल्फोंके बादलने मेरे दर्द की कसकको मरहम दिया ......

औसकी भीगी बूंदोंकी शबनममें नहाने का मौसम आ गया ,

सहराओं को बहार बनने का मौसम आ गया ,

पहले प्यारमें किसीके घायल होने का मौसम आ गया ,

बिछडे हुए प्यारकी यादोंमें खोकर

अश्कसे दामन भिगोने का मौसम आ गया ......

3 टिप्‍पणियां:

  1. नज़र हमारी कुचली गई आपकी एडियोंके तले
    और् फिर
    अश्कसे दामन भिगोने का मौसम आ गया ......
    बहुत खूब बहुत अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. औसकी भीगी बूंदोंकी शबनममें नहाने का मौसम आ गया ,

    सहराओं को बहार बनने का मौसम आ गया ,

    पहले प्यारमें किसीके घायल होने का मौसम आ गया ,

    बिछडे हुए प्यारकी यादोंमें खोकर

    अश्कसे दामन भिगोने का मौसम आ गया ......
    waah kya khubsurat ehsaas piroye hai atisunder.

    उत्तर देंहटाएं

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