25 जून 2009

एक खुबसूरत धोखा ....

सहरको शाम का इंतज़ार रहा ...

मेरी निगाहोंमें भी आपका इंतज़ार रहा ...

हर आहट पर आपके कदमोंका नामों निशान रहा

हवाके तेज़ झोंकोसे जोरोंसे बंद होने पर खिड़की के किवाड़

दिल कुछ ऐसे जोरोंसे धड़क गया जैसे

ये आपके आने का धोखा था ........

खयालोंमें गुम होकर आपके ही

कुछ खो जाते है यादोंके भंवरमें ...

आप ख़ुद आकर खड़े होते है सामने

और हमें लगता है कुछ यूँ की ये भी नज़रों का धोखा था .....

हाथों में जब हाथ थामें आपका

बैठे रहे थे रूबरू आपके

निगाहोंसे निगाहोंकी गुफ्तगू हो रही थी

तब लगा कुछ पल ये खामोशी का आलम भी धोखा था ....

कल फ़िर सहरको एक शामका इंतज़ार होगा ...

कल फ़िर हमें आपका और आपको हमारा इंतज़ार होगा .....

1 टिप्पणी:

  1. प्रीति जी कैसी है, आशा है कि सब कुशल होगा! आपकी कविताएँ बहुत सुन्दर लगती है!

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