7 अप्रैल 2009

गुजरे लम्होकी याद

जिंदगी अभी तो शुरू हुई थी
कुछ समझनेमें उसे शायद गलती हो गई है........
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खंडहरको देखा आज उम्रकी नजरसे,
इस वीरानेमें अभी यादें जवान थी...........
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आज इस सूनेसे मकानमें किसीकी आहटसे,
जमीं पर गदॅ को किसीके कदमके निशांकी चाहत हुई....

3 टिप्‍पणियां:

  1. आज इस सूनेसे मकानमें किसीकी आहटसे,
    जमीं पर गदॅ को किसीके कदमके निशांकी चाहत हुई....
    wwaahh bahut sunder

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  2. थोड़ा कसिए, शब्दों की फिजूलखर्ची कोई ज़रुरी तो नहीं, वैसे कविता भावपूर्ण है।

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