27 फ़रवरी 2009

ओ अजनबी हसीना ....


कारे कजरारे बालों की ये लट,

चान्दसे चेहरे को छू गई ॥,

उस लट को तुम्हारी ऊँगलीने

छूकर जब चेहरेसे हटाया ॥,

मन कुछ यूं बोल उठा यूं ,

लो पूनम का चाँद निकल आया .....

आंखोंके समुन्दरमें ,

उछल रही थी सपनोकी लहरें ऐसे ,

लहरोंके उस खुमारको जैसे तुम्हारी चिलमन पलकोंकी,

आँखों पर गिरकर संभाल रही थी .....

सांसोकी गर्माहटसे ,

तुम्हारे कमल की पंखुडियोंसे ये लब ,

शर्माकर यूं लाल हुए

और गूंजे उसमें से उठकर जो तुम्हारे अल्फाज ,

तो लगा जैसे विरानियोंमें कोयल हो कुक उठी .....

ए अजनबी हसीना ,

ठहर जाओ मेरी जिंदगीमें हमेशा के लिए .....

एक सपना बनकर ही ,

तन्हासी रातोंमें ,

ए जिंदगी तुमसे ,

कुछ गुफ्तगू करनी है ......

3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रीति जी आप कवितायें बहुत अच्छे से सी (लिख) लेती हैं :)
    प्रेमरस की यह कविता खूब लिखी है आपने.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...