29 जनवरी 2009

सपना बनकर सो जाने दो ...


काजलकी काली लकीरने तुम्हारी आँखें सजा दी थी ,

जब सामना हुआ तुम्हारा हमारा आज तो क्या हुआ !!!

दरिया छलक रहा था मोती बनकर पलक से तुम्हारी

काजल बाँध तोड़कर बह आया बाहर पलकों से ,

वो काली सी ,धुंधलीसी ,संदली सी लकीर एक

सज गई तुम्हारे चेहरे पर ऐसे दाग जैसे चाँद पर !!!!!!

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पंछीके पंख पर बैठकर मुझे थोड़ा उड़ने दो ,

झरनोंकी तेज धारों पर मुझे छलककर बहने दो .........

छुपी है अम्बिया पर जो कोयल उसकी कुक सा चहकने दो ,

मयूरके पंखो के रंगमें घुलकर थोड़ा सा नाच लेने दो .......

एक छोटेसे बच्चेकी आंखोंमें सपना बनकर सो जाने दो ,

सदा ये आ रही है किसीकी इंतज़ारमें मेरे ,चलो मुझे वहां पर जाने दो ......

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी यह कविता गहरी भावनाओं की अनुभूति कराती है

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