12 दिसंबर 2008

ख्वाहिश ...!!!!!!!!!!!!!




क्यों चिडिया को चलने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों पेड़ को उड़ने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों नदी को तनिक रुकने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों आसमां को बस्ती में जाकर सैर करने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों सहराको समुन्दरमें घुल जाने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों समुन्दर को बादलों की तरह उड़ने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों मयुराको कोयल की कूक की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों कोयल को घर के छज्जे पर बैठने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों आसमां को हरी भरी घास पर लेटने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों नजाकत के दरिया इस पुष्प को आसमां में उगने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों नारियल के तनेको एक अंगडाई की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों करेले के बीज को आमरस की मिठाशकी ख्वाहिश नहीं ?


क्यों हाथी को चींटी की तरह बीलमें रहने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों चींटी को शेर की एक दहाड़ सुनाने की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों तपते रेगिस्तान को बर्फ की चोटी की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों चुल्लू में भरे हुए इस बर्फ को तपिश की ख्वाहिश नहीं ?


क्यों इस धरती को सितारा बन जाने की ख्वाहिश नहीं ?

क्यों सूरजको चाँदकी चाँदनी की शीतल ख्वाहिश नहीं ?


क्यों डूब गए हो विचारों के समुन्दर में यूं ?

क्यों तैर कर पार आने की ख्वाहिश नहीं ?

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