1 दिसंबर 2011

रुक गया वो कारवां ....

बिखरते सिमटते पत्तोंके बीचसे एक बार
बहारने झाँका चुपके से और गुल मुस्कुराया ......
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सिमटे अल्फाजोंको तरन्नुममें पिरोनेकी एक कोशिश
और देखो ये  दिल छूने वाली टूटे दिलकी दास्ताँ बन गयी .....
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संगीतके हर सुरको छूकर गुजर गए हम ,
फिर भी एक दर्द बेठा था नज़्म बनकर सिसकता हुआ !!!!
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कोई उम्मीद कहीं खलिश बनकर चुभ सी गयी ,
और एक टीस मेरी फिर एक नज़्म बनकर निखर गयी !!!!
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एक वादेको निभाने कई वादे तोड़ दिए तेरे प्यार में
और देखो बेवफाई का इलज़ाम भी तुम्हीसे तोहफेमें ??!!
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मेरा सफ़र तो सात सुरोंके बीच गुनगुना रहा था कोई नगमा
हवा भी थम सी गयी थी और फिजा झुमने लगी, रुक गया वो कारवां ....

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