पतझड़ मे गिरते पत्तों के साथ
मेरे अल्फाज भी गिरते रहे ....
चमन रो रहा था सिसकियों मे,
अल्फाज अश्क बनकर बहते रहे ....
सुनी डालियों पर सन्नाटे का है घरौंदा,
इन्तजार मे बहार की आहट मे
सरसराहट से टहनी से चिपका रहा वो पत्ता .
मेरे अल्फाज भी गिरते रहे ....
चमन रो रहा था सिसकियों मे,
अल्फाज अश्क बनकर बहते रहे ....
सुनी डालियों पर सन्नाटे का है घरौंदा,
इन्तजार मे बहार की आहट मे
सरसराहट से टहनी से चिपका रहा वो पत्ता .