12 सितंबर 2015

औरत : तेरी कहानी

 एक लम्बा अरसा हो गया की मैं इस ब्लॉग पर निष्क्रिय रही  . जीवनमे कुछ कारण  ऐसे होते है की शब्दोंकी दुनिया और अनुभवकी दुनिया के बीच फर्क महसूस होता है और लगता है की अनुभव ही सार्थक जिंदगी का नाम है  . एक कल्पना की दुनिया और एक अनुभव की दुनिया दोनों के बीचका  एक फासला तय करना हर औरत की नियति है  . तो एक लघु श्रृंखला औरत के नाम पर शुरू करने जा रही हूँ  .इस में मेरा प्रयत्न रहेगा की एक स्त्री के जीवनके हर चरण को बिना कोई पूर्वग्रह लिख पाऊं  .
शुरुआत तो स्त्री भ्रूण से करनी पड़ेगी  . मुझे इस समस्या या उससे जुड़े आंकड़े नहीं दर्शाने पर मुझे यहाँ से जुडी शुरू होती एक औरतकी जिंदगी की कहानी उसकी ही जुबानी कहनी है  …
मैं सवा दो महीने का गर्भ हूँ  . काश मेरे पास जी पी इस सिस्टम होता और लोग इन का प्रावधान तो मैं यहाँ प्रवेश से पहले अपनी पसंदीदा जगह चुन पाती  . पर भगवानकी सिस्टम फूल प्रूफ है इस लिए मुझे वहाँ पर ही जाना पड़ेगा जहाँ मुझे वे भेजना चाहेंगे  . अंदर रहकर तो पता नहीं चल पाता  की मैं कहाँ हूँ  . पर विविध प्रकार से आती हुई आवाज शायद कह रही है की मैं भारत देश में पैदा होने जा रही हूँ  .
लोग मेरी माँ की अंदर मेरे आगमन से खुश तब तक है जब तक उन्हें पता नहीं होता की मैं आ रही हूँ  .  ऐसा मैंने सुना है  . पर आज रात मेरी माँ रो रही थी  .
मैंने अंदर से दस्तक देती हूँ  . माँ मुझ पर हाथ फेरती है  .
मैंने पहली बार कुछ कहा जो माँ ध्यान से सुन रही थी  . माँ को घरके काम से कभी फुर्सत दी नहीं गयी और माँ क्या जाने बहार कितना कुछ हो चूका है  !!!! " माँ ,अब सब कुछ बदल रहा है  . माँ तेरे मोबाइल से एक नंबर लगा  . 181   … इस नंबर से तेरी सहायता की जायेगी  . मैं जानती हूँ की तू मुझे प्यार करती है  . मेरी दीदी को भी यहाँ से अलविदा कहा था उसकी खुशबु अभी इस कोख में बाकी है  …  माँ तू डर  नहीं  …बस ये फोन लगा ले  . दुनिया में कोई साथ न दे तो चलेगा पर अब मैंने तेरा साथ देने की ठान  ली है  . चल हम दोनों ये दुनिया की स्त्री के लिए जीने लायक बनाने की एक छोटीसी शुरुआत करे !!!!"
और माँ ने फोन लगाया  …"
अब कानून भी स्त्रीभ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज उठाने वालों के साथ है  …  

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