29 नवंबर 2011

ख़ामोशीके दायरोंका दुशाला

ख़ामोशीके दायरोंका दुशाला लपेटकर खुद पर
बस रातके जाम को पिने के लिए
सड़क पर चल पड़े यूँ ही बेवजह से ....
एक सरसरी ख़ामोशीके सफे पर बिछी
अँधेरी रातकी आगोशमे लिपटी हुई
वो सिसकी पल भरमें
जैसे कोई आभास हो गुम हो गयी ...
राहों पर चलते चलते कुछ चुभ गया ,
देखा तो कोई दिल टुटा था
उसकी किरचें बिखर रही थी ,
छुआ उस सरजमीं पर
तो आंसुओकी बौछारसे किसीकी वो भी गीली थी ......
शायद ये कब्रथी किसीकी चाहतकी
एक फूल जो हाथमे था
खुद ब खुद वहीँ गिर गया .....

28 नवंबर 2011

हाँ हाँ वो शाम थी एक खास ..

हाँ हाँ वो शाम थी एक खास
लिए तेरा हाथोंमें हाथ
भीड़ में भी खुदमे मस्त हो कर चले जा रहे थे ,
मंजिलोंकी तलाश न थी ,
बस तेरे साथ की एक प्यास लिए
हर लम्हों पर तुम्हारा नाम लिखे जा रहे थे ......
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एक बच्चा सो रहा था कबका भीतर ,
कल वो खिड़की खोलकर देख रहा था ,
नाप रहा था आसमानकी ऊंचाई
और पंछीकी उडानको भांप रहा था ....
कूदा वो खिड़की को लांघकर ,
चला गया वो बाग़में तितलीके पीछे ,
दौड़ता हुआ फांदता हुआ ...
यहाँ पर ही तो थी वो वाली आसमानकी ऊंचाई
यहाँ पर ही तो थी वो पंछी की उड़ान !!!
वो बच्चा आज उम्रके बंधन तोड़ कंचा खेल रहा था !!!!
वो बच्चा बस आज खुलकर हंस रहा था !!!!
वो खिड़की को बंद नहीं करता कभी ,
क्योंकि आसमान पर लिखे अफसाने पढनेकी आदत है उसे !!!!

27 नवंबर 2011

जिसे मैं जन्नत कहता हूँ .........

कहीं चुप्पी साधे कुछ कुछ कहती हुई वो बेबाक आँखे
अल्फाज़का काजल उसकी आँखोंमें अफ़साने लिख रहा था ...
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कभी कभी कुछ भी कहेना लाज़मी नहीं होता है ,
इम्तेहाँ होता है ये इश्कका जो कहा न जाए वो महसूस करना होता है ...
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ख़ामोशीसे टपक रही थी तेरी वो सदायें ,
मैं हथेली पर उस लिखता चला गया .......
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चाँदको सजाया है अपनी हथेली पर आज ,
ऑसकी बुन्दोसे नहलाना है उसे ,थोडा मैला हो रहा है ....
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दांतोंमें उंगली दबाये हुए चौंधियाती हुई वो नज़र तुम्हारी ,
कैद है वो तस्वीर मेरी खयालोकी दुनियामें जिसे मैं जन्नत कहता हूँ .........

25 नवंबर 2011

फिर उसकी याद आ गयी ....

बस आज यूँही अचानक तन्हाईके आलममें
फिर उसकी याद आ गयी ....
वो जो होठों पर मुस्कराहट लेकर चला आता था ,
वो जो सिर्फ बोलता जाता था ,
वो जिसे सुनना मेरी आदत हो चुकी थी ,
वो जो कुछ भी नहीं कहकर बहुत कुछ समजा जाता था ,
वो जिसकी बाते कुछ और थी
वो जिसकी बातोंका मतलब भी कुछ और था ,
वो जिसकी बातें तो सिर्फ एक बहाना थी
वो जो मेरे साथ गुजरे वक्त को सिपीमे  कैद करके ले जाता था ,
वो जिसके साथ मैं तो हरदम थी ,
वो जो मेरे ख़ुशी को वजह था ...
वो जिसे भुलाना मुमकिन नहीं था ...
वो जिसे शिकवा रहा मैंने याद क्यों नहीं किया ....
वो जो जिसे आज पहली बार कह रही हूँ ....
वो तुम मेरी सांस हो जिन्दा रहनेकी वजह हो ...
वो तुम क्यों दिल की धड़कन बन गए ????

23 नवंबर 2011

इसी दरख्तके नीचे...

चुपचाप चली जाती है वो सड़क पर तेरी क़दमोंकी आहट,
मैं उसमे तेरे कदमोके निशाँ देख लेता हूँ चुपकेसे ,
हवाकी हर लहर ,जर्रे जर्रे पर बिछा हुआ वो गर्दका कतरा ,
तेरा पता देकर चले जाते है चुपचाप .....
फिर भी मैंने तुम्हारा पीछा करनेकी कोशिश नहीं की है ,
क्योंकि उस पलके इंतजारमें बिछायी है ये आँखें
जब ये रस्ते हमें आमने सामने ले आयेंगे ,
और मेरी निगाहोंमें तुम मेरे प्यार का अफसाना पढ़ लोगे ....
बस अब तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहेगा ...
इसी दरख्तके नीचे...
हर सहर ...
हर शाम ....

21 नवंबर 2011

सिर्फ सुनना लाज़मी है....

बिना कुछ कहे सिर्फ सुनना लाज़मी है ,
बिना कुछ सुने सिर्फ  कहना लाज़मी है ,
तुम थे तो जिंदगीमें बहार खिलती थी वीरानेमें भी ,
तुम बिन  बहारोंमें भी हंसते नहीं गुल फिज़ाओंके ...
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कुछ तुम न समजे ,
कुछ मेरी भी खता रही है ,
एक तुमसे जुदा क्या हुए ...
जाना की अब जिंदगी भी सजा हो चुकी है .......
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जब चाहा है तुम्हे दिलो जान से
नफ़रतको जताना मुमकिन नहीं
होठो पर तेरा नाम न हो भले मेरे
दिलसे तुझे निकालना मुमकिन नहीं मेरे लिए ......

20 नवंबर 2011

हवा के संग संग ....

उड़ता हुआ वो पत्ता एक शाखसे जुदा
न जाने ये हवाका साथ कब तक निभा पायेगा ,
ठहरेगा जब कहीं एक जगह
उसे टहनीका प्यार बहुत याद आएगा .....
सूखे उसके आंसूकी एक बूंद भी जब बहा न पाए वो
दर्द अपना कैसे बयां कर पायेगा ????
वो कोई पगडण्डी होगी या भीड़से भरी सड़क
ये भी उसको पता नहीं मगर .....
ठहरने के लिए कोई सांस नहीं एहसास तो है ,
दरख़्त की घनी शाख पर जब जन्मा था वो ,
उसने दुनिया न देखी थी ...
बस चुपचाप खड़ा रह जाता था जहाँ पर था ....
आज साथ छुटा साथ दरख़्त का तो क्या हुआ ....
आज इस खुबसूरत दुनिया का नज़ारा थो हुआ ...
हवा के संग संग ....लहरोंके साथ साथ ....

19 नवंबर 2011

मेरे खयालोमें आया न करो

तेरे नामकी कशिश तो ये रही ,
मैं जलती रही बिरहा की आगमें ,
याद करने की फुर्सत कहीं नहीं अब
भुलानेको कभी तुझे वक्त मिला ही नहीं ......
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मेरे सिरहाने एक शब सहला रही थी ख्वाबको,
बड़ा बेताबथा वो भी मेरी आंखमें समाने को .........
एक सफे पर वो ख्वाब खुदको लिखता रहा ,
सहरमें पढ़ा उसे तो ये दास्ताँ दिलकी नज़्म बन चुकी थी ......
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बस इस तरह मेरे खयालोमें आया न करो ,
डर ही मुझमे मेरे लिए कोई जगह न बच पायेगी ........
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खुदके निशाँ ढूँढने निकले तो
हर कदम हर पल पर तुम आशियाँ बनाकर बसे थे ....
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बेचेन रूहको तलब है एक सुकूनकी ,
फुरकतमें फिर वो लम्हे सहलाने के लिए .......

18 नवंबर 2011

एक मुखौटा पहनकर

आज चेहरे पर एक मुखौटा पहनकर निकले है ,
दिलमें ख़ुशी है
फिर भी गमको चेहरे पर सजाकर निकले है ....
आँखोंमें भरे अश्कको
अभी तो पोछा है एक पल पहले
तुमको देखकर
मुस्कुराते हुए घरके बहार निकले है .....
उस सूखेसे अश्ककी बूंदको
 गालो पर देख लिया तुमने,
हमने हंसकर कह दिया ,
बड़े दिनोके बाद मिले आँखें छलक गयी .....
तुमने शायद जाना है मुझे खुदसे भी ज्यादा ,
इस लिए कह दिया ,
मेरा इंतज़ार तो कहीं इन अश्ककी वजह तो नहीं ???
नज़रें झुका दी हमने ,
और हौलेसे कहा ,
ये बेमुर्रवत अश्क भी बेवक्त निकल आते है ....
मेरे चेहरे को अपनी ऊँगलीसे उठाकर
मेरी नज़रसे खुद की नज़र मिलाकर
पूछ बैठे तुम भी ....
इन आँखोंको तुम्हारी जूठ बोलना आया ही नहीं कभी !!!
प्यार इतना करते हो
तो पहले क्यों न बताया कभी ???!!!!

16 नवंबर 2011

चाँद कल करवट लेकर....

चाँद कल करवट लेकर इंतज़ार कर रहा था ,
उसे भी कल मौसमका इंतज़ार था ...
गर्मीसे जुलसकर उसके पसीनेकी बुँदे
आसमानमें तारे बनकर लहरा रही थी ....
उसे उस कपकपाहटका था इंतज़ार था
जो जाड़ेका जोड़ा पहनकर दुल्हनसी सजी आ रही थी ......
चाँदको अपनी हथेलीमें तराशकर बंद कर दिया ....
सिमट गया वो बर्फ सा जम गया ....
उस चाँदके टुकडे पर मेरा नाम लिख गया .....
हँसते हुए चाँद को जब अलविदा किया सुबहमें
उसने भी एक नगमा गुनगुनाया शायद ....
वादा देकर चला गया की फिर मिलने आऊंगा जल्द .......

15 नवंबर 2011

एक सपनोकी परी ...

एक दुनिया है मेरे सपनोकी
उसमे एक  सपनोकी परी रहती है ....
रोज रोज रातको वो सितारे पहनकर आती है ,
चांदकी चुनरमें वो अपना चेहरा छुपाती है ....
नाम उसका पुकारे कभी तो
हंसकर वो शरमाती है ...
दामन उसका थामकर साथ साथ चलूँ
तो हलकेसे दामन छुड़ाती है ....
उस परी को हम मुस्कान कहकर पुकारते है ,
मुस्कानकी मुस्कराहटसे
मेरे दिलकी वादियोंमें बहारें निखर जाती है ...
एक दुनिया है मेरे सपनोकी
उसमे एक सपनोकी परी रहती है ....

14 नवंबर 2011

बालदिवस मुबारक हो ....!!!!!

आज सुबह सुबह में मोर्निंग वोकसे घर वापस आ रही थी ....मेरे घर के ठीक बाजुमें एक स्कुल है ...रिक्शासे उतरकर एक छोटी सी बच्ची रो रही थी ...उसकी दो दोस्त उसे समजा रही थी ...रिक्शावाले भैया भी कह रहे थे की तुम्हे आज पता नहीं था इस लिए तुमने नए कपडे नहीं पहने .....कोई बात नहीं ...
एक बात देखी...बच्चेका रोना सिर्फ उसकी माँ या उसके पिता नहीं पर उसकी उम्र के दोस्त और वह हर व्यक्ति जो उसकी जिंदगीके रोजमर्रा के हिस्से है उन सब को असर करता है ...हर कोई अपनी बातसे उसको शांत करने के प्रयासमें जुट जाता है .....एक मासूमसी बात देखी आज सुबह बाल दिवस के दिन ..........
आज हर बच्चे को अहमियत दी जायेगी ...उसे लाड दिए जायेंगे ....सब पत्र पत्रिकामें कल मजदूरी करते बच्चोकी तस्वीर छापी जायेगी ...समाजको सन्देश दिए जायेंगे ...फिर कल से वही ढांचेकी जिंदगी फिर शुरू .....
वो झोंपडपट्टीके बच्चोकी जिंदगीकी दुर्दशा भी दिखाई जायेगी .....
पर एक बात जो कहना चाहूंगी की आपके घरमें भी एक बच्चा है .....जिसकी मुश्किल रोटी कपडा मकान या शिक्षा नहीं ...पर कुछ ऐसी चीजें जो इधर बता रही हूँ वो जरुर हो रही है ......ये बात गरीब या अनाथ बच्चे की नहीं ये एक समजदार और उच्च वर्गके कहलाते बच्चे की ही है ....
१. मोडेलिंग करते बच्चोको पैसे क्या होते समज नहीं होती पर उनका बचपन कहाँ घूंट जाता है ...पैसा और प्रसिध्धि के चक्कर में ...!!!!वो प्यारेसे बच्चे की जिंदगीके बारेमे हम जानते है पर उसके अभिभावक उसकी और ध्यान नहीं देते की उसका बचपन कहाँ ????
२.रियालिटी शो में आते बच्चे .....बहुत कुछ छप चूका है इस के बारे में ...पर प्रसिध्धि और पैसेके मोह में माँ बाप द्वारा उस मासूमकी जिंदगी को बलि चढ़ाया जाता है ....हार जीत के मायने जिसे समज न आये हो उसके लिए अभिभावक द्वारा उसे वक्त के पहले बड़ा कर दिया जाता है .......
३. महंगाई बहुत है ...पति पत्नी कमाने जाते है ....क्रेशमें , या विडिओगेमके हवाले , नुडल्स और पिज़ा के हवाले होता बचपन ..मोटापे और उससे जुडी बिमारियोंका वरदान बचपनमें ही देने लगा है .......बड़ी उम्रके बुजुर्गके लिए ये बच्चे एक जिम्मेदारी होते है ...और उसके बचपन को वो एन्जॉय नहीं कर पाते ....
ऐसे माँ बाप अकेलेपनका तोहफा बच्चो के देते है जिसका हर्जाना शायद बुढ़ापेमें वृध्धाश्रम  में जाकर उन्हें चुकाना पड़ता है ...ड्रग एडिक्शन के केस में शुरुआत ये एकेलेपनसे ही होती है ......
४. बच्चोके कंधे पर पुस्तकोंका ढेरका बोझ  लादकर सुबह स्कुलमें जाते है ...लौटते है होमवर्क का बोज लेकर ....मम्मी पापा का इंस्ट्रक्शन का बोज ....होबी क्लास के बोज में ....
वो मस्ती वो तूफान जो हमने किये थे अपने बचपनमें वो सब गुम हो गए है ......
इस बाल दिवस पर हम अपनी अपेक्षा का बोज उनके नाजुक कंधेसे हटाने का गिफ्ट देकर उन्हें कह पाएंगे ????
बालदिवस मुबारक हो ....!!!!!

12 नवंबर 2011

एक ख्वाबोकी चद्दर

तानोबानोंसे बुनी एक ख्वाबोकी चद्दर ,
हर एक दिन एक नए ख्वाबका बोज़ लादे
तकती रही आसमानको रातभर
एक नींदका झोका हो और नींदमें उस ख्वाबका दीदार .........
नींद तो दम ब दम कदम ब कदम दूर सरकती है ,
क्योंकि उस ख्वाबोकी ताबीरके लिए
जागते हुए कुछ कर गुजरना होता है ,
सोते हुए नींदोंमें ख्वाबोसे हुआ नहीं कुछ हासिल कभी ,
नींदों को गंवाकर उन ख्वाबोकी सच्चाई को परखना है ......

11 नवंबर 2011

कांपती सिलवटोंमें

कांपती सिलवटोंमें सिमटने लगी है रातें ,
ठंडी हवाएं दस्तक दे रही है तेरे आने की .....
बस थपथपाती है तू और हम कम्बलमें छुप जाते है ....
और ये सूरज भी कितना अलसा जाता है आजकल ,
वो भी दिन ब दिन रोज के रोज अब देरसे आता है .....
जब आँखें खुलती है सुबह तो पता चलता है
आज हर काममें थोड़ी देर का होना लाज़मी है ....
पर ये लम्बी होती नींदकी सलवटे
दे गयी मुस्कराहट मुझे एक
क्योंकि आँचलके साये तले
एक खुबसूरत लम्हा था तुम्हारी और मेरी गुफ्तगू का
जो चल रही थी उन लम्हों के दरम्याँ...........

10 नवंबर 2011

बिना वजह...

बिना वजह खिली खिलीसी वह हंसी 
जो होठों पर ठहर जाती है ,
वजह तो कोई नहीं होती यूँही 
पर किसी चीजकी याद उस लम्हे अक्सर आती है ....
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नहीं होती वजह जीनेकी तेरे बगैर 
फिर भी जिन्दा रहने की कोशिश करते रहे तेरे बगैर 
हौसलोंसे होती है जीनेकी ख्वाहिश बुलंद 
तेरे दिदारकी ख्वाहिशसे रहे जीनेके हौसले बुलंद ......
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तेरे अश्कको दामनमें संभालकर रख लेना 
मिलने पर उस अश्कका क़र्ज़ चुकाना पड़ेगा 
फुरकतके हर लम्होंको लिख लिया उस बूंद पर 
फिर उन्ही अश्कको मिलनकी ख़ुशीसे भरना होगा ......

7 नवंबर 2011

कभी कभी बिना वजह....

कभी कभी बिना वजह ठहर जाती है 
आकर एक मुस्कराहट मेरे चेहरे पर ....
वो लम्हा या वो तुम्हारी बात 
फिर कानोमें गूंज जाती है ....
मेरे हाथो पर तुम्हारा स्पर्श 
अब भी उतना ही ताज़ा है ,
मेरी हथेली पर एक तस्वीर बनकर सजा सा ......
तुम तो कितने दूर चले गए मुझसे यूँ ....
तुम चाहे कितने भी रहो ओज़ल कभी 
मेरी यादों पर तुम्हारा कभी इख्तियार न होगा ...
मेरे कदम रुक जाए भले तुम तक आते आते ,
बिन बुलाये मेरे जहन पर दस्तक देती तुम्हारी याद 
मुझ तक पहुँचनेके लिए कभी इज़ाज़त नहीं लेती तुम्हारी ........
ये मुस्कराहट भी कभी खुशबु बिखेरती है 
कल हवाएं तुम तक वो लेकर आयेगी ...
न चाहोगे फिर भी तुम्हे वो मेरी याद दिलाएगी ....
क्योंकि मुझे मेरी चाहत पर पूरा ऐतबार है .....

5 नवंबर 2011

सिर्फ हम और हम .....

वो बीते दिन वो गुजरे पल वो प्यारी बातें 
कुछ मायने नहीं थे जिसमे 
उन बातोंमें रहे अर्थ अब समज में आये है ,
तुमसे होते थे दिनके आगाज़ सारे 
दिन तुमसे होते थे ख़त्म सारे ,
वो लड़ना वो झगड़ना 
फिर दूसरी सुबह तेरी खिड़की पर लटककर 
तुझे ही पुकारना ...
और वो तेरा ही आना तुरंत तेरा बल्ला और मेरी गेंद ......
इमली के पेड़से इमली गिराना 
और वो टिल्लीके हाथमें थमाना...
धुलसे सने पैर और बहती नाकको कमीजकी बाहोंसे पोछना .........
वो मेरी जिंदगीकी पहचान थी ....
आज वही दोस्त मेरे सामने थे ....
अरमानीके सूटमें ,डिजाइनर गोगल्समें ,मर्सिडीज़ कारमें ,
बहुत अजनबी लगे ...
हम तीनो कारमें बैठकर गए फिर उसी गाँव में ....
पेड़ के तने के पीछे पुराने कपडे पहने ..बूट रख दिए ....
और फिर वही राजा,मुन्ना और मुस्तफा ....
दौड़ पड़े जंगलकी और ....
वो पल ढूँढने के लिए ....
हाथमे हाथ थाम कर ......
सिर्फ हम और हम .....
वो ख़ुशी जो कोई बाज़ारमें नहीं मिली थी ....

3 नवंबर 2011

जवाब हो तुम...

मेरे हर सवालका जवाब हो तुम ,
फिर भी मेरे सवाल अनसुनेसे क्यों लगे ?
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कोई किसीको चाहे बेशुमार ये कसूर तुम्हारा नहीं 
क्योंकि चाहत पर कभी इस दिलका इख्तियार नहीं .....
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जो नज़र भी ना आए वो साथ चलते सायेको एक सवाल 
क्यों घने अंधेरोमें तुम मेरे साथ नहीं होते कभी ???????
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जिसे नज़रें ढूंढती जाए हरदम 
वो अक्स तुम्हारे आयनेमें छुपकर बैठा है कहीं ....

1 नवंबर 2011

साथ साथ ......

चलते चलते यूँही कोई अजनबी मिल गया ,
बस जाना पहचाना एहसास दिलमें आकर रुक गया ....
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हाले दिल बयां न हो पाए ,
लब्ज़ रुक जाए सिलवटोंमें कहीं 
आँखोंसे हर अनकही बयां हो जाए ,
वो सुन ले और हयासे ये पलकें झुकती जाए ....
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एहसासकी हरकतसे होती  रहे धड़कन बोजिलसी यूँ ,
रातकी गहरी ख़ामोशीमें  कुछ और गहराती रातें ये 
बस आवाज़ गूंज रही है फिजाओमें 
एक नाम तुम्हारा है एक नाम मेरा भी है साथ साथ ......

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...