31 अक्तूबर 2011

यूँ चलोगे साथ ????????

बदली हुई नज़र 
बदल गया हर नज़ारा ...
नया वक्त 
नए पल 
नयी खुशबू 
नया ख्याल ...
नए सपने ...
नयी हर बात है ....
खुद तो बदली नहीं कभी 
फिर भी शायद बदले हुए हालात है ....
फिर करवट लेता वक्त 
फिर थमा हुआ लम्हा ...
फिर दिल बेक़रार ...
फिर उसे मिलने का इंतज़ार ...
फिर बस मैं और तुम और ये पल ....
फिर एक सवाल ...
मेरे साथ मेरा हाथ थामे यूँ चलोगे साथ ????????

26 अक्तूबर 2011

हार्दिक अभिनन्दन....

जिंदगीके अँधेरेको एक ज्योतिसे उजागर करने का पर्व 
हर कड़वाहटको मिठासमें बदल देनेका अवसर 
तिमिरसे उजालो तक का एक सफ़र 
जीवनपथको रंगोंसे सजा लेनेंका मौसम 
हर नए पुराने रिश्तोको प्यार की लड़ीमें पिरो लेने का त्यौहार 
दीपोंसे ज़गमगाती ,
मिठाशकी महक लिए ,
मनआँगनमें सुनहरे  रंगोकी रंगोली सजाये 
ये पुण्य पावन अवसर दीपावली पर सभी को 
मेरी और से हार्दिक अभिनन्दन 
और 
नववर्षकी शुभकामनाएं .......

25 अक्तूबर 2011

वो पहली बार !!!!!

वक्तके खाली खानेसे फिर एक लम्हा गिर पड़ा ,
न जाने क्यों कैसे वो सरक गया मुझसे ,
एक लम्हेमें सारा युग सिमटकर पड़ा था 
वो मेरा होकर मुझसे ही क्यों खतावार था ????
एक और सफा जिंदगी का फिर पल्टा...
एक और दीवाली आई ....
एक बार फिर दीप जलाये गए ...
एक बार फिर यादोके घरौंदे साफ़ किये गए ....
एक बार फिर घर सजाये गए ...
फिर भी चुपके से वो लम्हा कहीं बैठा रहा अब तक ,
आज मुझे छोड़ जानेके लिए बेताब सा .......
खुबसूरत वो लम्हा ,
जब फूलजड़ीसे मेरी उंगली पर जलन हुई थी 
और मेरे हाथ को थाम दोनों खुले नल के नीचे 
एक दुसरेको देखते एक दुसरे की आँखोंमें गुम हो गए थे 
पहली बार ......वो पहली बार !!!!!

24 अक्तूबर 2011

तेरा अक्स ,

तेरे सामने बैठा तेरा अक्स ,
तुझे अपनासा लगा पहेली बार क्यों ???
किसीने आकर मुझे अपना कहा ,
तब वो अक्स मुझे अपना लगा किसीका होकर भी ....
पहले प्यारके एहसाससा ये 
कोई लालिमा छोड़ गया चेहरे पर ???
ये इकरार था या एक अनकहा अनसुना अफसाना 
जहाँ खुद ही रजामंद थे खुद ही नाराज़ भी .....

22 अक्तूबर 2011

जिंदगी आज आई मेरे दरवाजे

जिंदगी आज आई मेरे दरवाजे 
कुछ वादे करने कुछ वादे लेने को ...
मैंने पूछा चलो आज कुछ ऐसे कर दे 
न कोई वादा तुम करो न हमसे लो ........
फिर मिलेंगे दोनों दीवाने कुछ ऐसे 
जीकर देखे वो भी जिंदगी 
जो किसी वादोंके बंधनसे हो परे ...
बेबाक ,बिंदास , आज़ाद .....
जहाँ कोई न हो सवाल न हो कोई जवाब ....
बस उसका पल हर एक हो खास खास खास .......
बस एक दिन एक दिन एक दिन .....
मैं सुकूनसे बैठी एक खिड़कीके बहार तकती हुई ....
जिंदगीकी खुशियों को पाया मुझे तलाशते हुए ....
जिंदगी के गम को भी पाया मेरा पता पूछते हुए ....
पर आज मैं आज़ाद थी हर वादे से परे थी ...
मुक्त ,उन्मुक्त ......

21 अक्तूबर 2011

क़यामत गुजर जाए ...

शायद ये रात है क़यामत गुजर जाए ,
एक पल सांस थम जाए और हम जिन्दा रह जाए ......
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तुम पर क्या गुजरी होगी 
जब तुम्हारा नाम न होठो पर आ सका ,
पहचान तो जन्मो की थी 
और वो फ़साना अधुरा ही रहने लगा .....
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मेरे दिलके ज़ख्म गिनके क्या होगा हासिल ,
दर्द तो बस एक ही था की तुम मुझे मिल न सके ........
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कहाँ कोई नाम पता पूछकर आती है वो 
बस एक ख़ुशी तो है जो बिनबुलाये बिन बताये चली आती है .....

20 अक्तूबर 2011

किसकी तलाश है ????

मुद्दतें गुजर गयी 
एक शाम सुकूनकी देखी थी ,
गहरी ख़ामोशीको ओढ़ 
मैं छतको ताककर सोई थी .....
न गर्दिश थी न रंजो गम कोई ,
बस चुपचाप तकती मेरी दो आँखें 
एक ख्याल ....एक नर्म हंसी ...
सब कुछ तो है पर फिर भी कुछ नहीं पास है ,
न जाने जिंदगी को अब फिर न जाने किसकी तलाश है ????

18 अक्तूबर 2011

समंदर एक मिला मुझसे ...

समन्दर बहुत बड़ा होता है ,
इतना विशालकी आँखोंके आगे भी उसकी सरहदें ख़त्म नहीं होती ,
पर उस विशालताको क्या कहे ???
उसके जलकी बूंद भी प्यास मिटा नहीं सकती ....
उसमे हम भीग नहीं पाते ???
ये सागर पास हो ना हो कोई फर्क नहीं पड़ता ..........
बस उसके साहिल पर बरसोंसे बिछी वो रेत की चद्दरे 
भीगती है ,पर फिर भी भीतर कोरी कोरी .....
किनारे पर उगे नारियलका एक पेड़से पूछ बैठी ,
कैसे इस नमक को हजम करके तुम मीठा जल देते हो????
उस भीगी रेत पर लिखकर नाम हर रात चली जाती हूँ ....
कोरी मिलती है फिर वो स्लेट नया नाम लिखने के लिए ....
समुन्दर के किनारे ये खेल जो बरसों से हो रहा ....
एक प्यास और पानी की अथाह राशी समेटे जलराशि के बिच ...

17 अक्तूबर 2011

एक दरवाजे पर

एक दरवाजे पर जाकर दस्तक देकर सोचा ,
शायद मुझे लौट जाना चाहिए ....
अब वो नहीं जिसके लिए इस दर पर आये है ,
उसने ही दरवाजा खोला ...
सामने ख़ुशी थी , शरमाईसी ,लजाई सी ,
एक बेबाक ,पाक ,रूहानी नूर लिए ....
मैंने पूछा क्यों छुप रही हो ????
हौले से कहा उसने क्या करू ???
मुझे तो पैसोंसे खरीदनेमें दुकानोंमें मोलमें हुजूम उमड़े है ,
क्या पता उन्हें मेरा पता कोई नोट पर नहीं लिखा है ,
न ही मैं खरीदी या बेची जा सकती हूँ ...
फिर भी ये जानते हुए जब बेचेनी होती है ,
बस मैं यूँ ही तन्हाई में चली जाती हूँ ....
और जानती हूँ तुम्हारे पास जो है मेरा पता ...
बस तुम मुझे कहीं न कहीं ढूंढ ही लोगे !!!!!

16 अक्तूबर 2011

बहते आंसुओकी जुबाँ...

बहते आंसुओकी जुबाँ सिर्फ दर्द ही तो नहीं ???
चलते रहते है साथ साथ वो हमसफ़र शायद हमदर्द नहीं .....
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गिले शिकवे तो करते है उसे 
जब दुनिया दर्द दे तो ,
अब बताओ वो नाम-पता  
जहाँ हम बयां कर सके 
वो दर्द ,वो झख्म, वो अश्क 
जो उसने मुझे तोहफेमें दिए !!!!!!
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न दो दर्द उतनाकी उसकी कशिश कम हो जाए ,
जो नाम रहता हर वक्त जुबाँ पर वो नाम जुबाँसे ओज़ल न हो जाए ...
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तेरी ग़ुरबत ,तेरी फकीरीको भी गले लगाकर चले तेरे साथ 
बहुत दूर चलते चलते हम इस मक़ाम पर आकर रुके है ,
ये तेरी बेरुखी ,ये तेरी बेदर्दीके आलममें अब जाएँ कहाँ 
वो सारी देहलीज को हम पीछे छोड़ चले तुम्हारे लिए !!!!!
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किसीसे गिला शिकवा क्यों करे अब 
जब हथेलीकी रेखाओमें तुम्हारा नाम ही नहीं था !!!!!!

15 अक्तूबर 2011

सूखेसे पत्ते उड़ते

 सूखेसे पत्ते उड़ते हुए मेरी खिड़कीसे 
मुझे पूछ बैठा क्या मैं अन्दर आ जाऊं ???
मैंने पूछा उसे क्यों आना चाहते हो ...
इतना बड़ा आसमाँ खड़ा है तुझे आगोशमें लेने !!!
उसने कहा पनाहकी चाहत है मुझे ...
यूँ उड़ना हवाओके साथ ये मेरी ख्वाहिश तो नहीं ...
ये मेरी बेबसी है मैं साथ हूँ उनके वो ...
पर तेरी पनाहमें थोड़े सुकूनकी आरजू कोई गुनाह तो नहीं ??!!
में मंजिल हो न हो वो मुझे लेकर चलते है मुफलिस समजकर ,
क्या हुआ बिछड़ गया फिजामें पेड़से ,
पत्तेकी शख्शियतको भुला दू ऐसा बेवफा तो नहीं ,,
प्यार की सुगन्ध है उस दरख़्त की 
 और मिटटी की खुशबू अभी भी मेरे भीतर....
बिछड़कर उससे गुमशुदा हो जाऊं ये रंजिश तो नहीं !!! 

14 अक्तूबर 2011

हाले दिल कहती हुई ....

सूखे हुए पत्तोके साथ उड़ता हुआ ये वक्त ,
कहीं उठ उठ कर चलता है ,गर्द के साथ जुड़ता हुआ ....
उस वक्तके पल्लूमें बंधकर बैठी ये जिंदगी ठहर गयी ,
एक सहरके आखरी तारेसी .....
डूबते सूरजकी आखरी किरणसी ...
सहमी सहमी ...
फिर भी खामोश लब्जोंमें हाले दिल कहती हुई .... 

12 अक्तूबर 2011

मायने तलाशती है...

कभी कभी मुक्तलिफ़सी ये जिंदगी खुदमें मायने तलाशती है ,
लगता है जैसे खुदका अधूरापन जब रास न आये 
ये खुद से ही उकता सी जाती है ...
कह देती है ...मुझे छोड़ दो इस मोड़ पर मैं किसीके इंतज़ार में हूँ ....
अरे फिर पीछे से कोई आकर मेरा नाम पुकारता है 
और खुदकी पहचान जिंदगीके नाम पर दे जाता है ...
एक अजनबी ..एक हँसता चेहरा ...
एक पल ...और फिर दूर कहीं सपनोसा खो जाता है .......
और फिर ये जिंदगी उस मायने में जीने लगती है ....

11 अक्तूबर 2011

क्योंकि ये रात शरद पूर्णिमाकी है ....

चाँद शरमा रहा होगा आज ,
चांदनीका हाथ थामे वो जब आएगा ,
नज़र टिक जायेगी इस दुनियाकी उस पर ...
कैसे करेगा गुफ्तगू वो सितारोंसे 
कैसे पढ़ेगा वो हर नज़्म 
जो उसने रातके दामन पर लिखी है हिजरके आलममे 
तीस दिन के बाद आती है ये रात 
जब चाँद पुरे शबाब पर होता है ...
और आज चाँद गुजारिश करेगा 
एय इंसान मुझे भी तुम्हारी तरह इश्क हुआ है ,
तुम्हारी तरह मैं भी तारीफ करना चाहूँगा 
मेरी महबूबा रात आज सारे सितारे ओढ़ आएगी ,
बस दो पल मुंह उधर कर लेना ....
जब वो मेरे दामन पर छोटे से ये दाग को चूमेगी .....
क्योंकि ये रात शरद पूर्णिमाकी है ....
मेरे संग तुम्हारे चलने की है ...
पलकें उठाकर रात जब होठ खोल देगी ,
बस हर प्रेमीकी आरजू शायद वही बोल देगी ....
शर्माकर चिलमनसे चाँदके हर राज़ खोल देगी ....
बस एक पल अपना चेहरा उधर कर लो ...
आज मुझे भी चांदनी ओढ़कर बैठी रात को देखना है रात भर ....

10 अक्तूबर 2011

जगजीतसिंहजी के नाम ......

परिस्थितिका स्वीकार करो ....इसका जितनी जल्दी स्वीकार कर लेते है उतना ही हकीकतका सामना करना आसान लगने लगता है ....
जैसे की आपने आज कहा ...इकलौता बेटा विवेक जब इस फानी दुनियाको अलविदा कह गया होगा तब उनपर क्या गुजरी होगी ...जवान बेटेके जनाजे का बोज बापके कंधे पर वो दुनिया का सबसे भारी बोज करार दिया गया है ....उसी वक्त अपनी जीवनसंगिनी का साथ छोड़ देना ....उस इंसानकी आवाज में हम अपने सवालोंके जवाब पाते है ...अपने गम भुलानेकी वजह पाते है ...लेकिन वो इंसान किसके पास गया होगा ...संगीत के तार छेड़ते पहले कोई बंदिश बनाते वक्त उस समय पर उसने किसका सहारा लिया होगा ???
बस येही बात है की खुद के गमके लिए हम हमेशा सहारे की तलाश बाहर करते है ...लेकिन वो ताकत तो हममे ही छुपी होती है उसे आवाज नहीं देते ....हमने किसीको सराहा ...वो हमारी जरुरत बन गया ...लेकिन कभी उसकी जरुरत के बारे में नहीं सोचा .....
हर जन्मके पल ही लिखी जाने वाली एक लकीर वो हमारे जीवन का अंत होती है ये हम जानकर क्यों भूल जाते है ......पंद्रह दिनोंसे मौतके साथ झूझने की वो तकलीफ ,पीड़ा हम कभी बाँट नहीं सकते ...सिर्फ दुआ ही कर सकते है ...
खुशनसीब होते है इनके जैसे इंसान जो घरोंमें नहीं लेकिन लोगोके दिलो में रहते है .....फिर भी हर मौत हर व्यक्ति के लिए एक शुन्यावाकाश पैदा कर ही देती है और उससे उभरना भी खुद ही पड़ता है ........
उनकी जगह हम खुद को रखकर देखे तो शायद मालूम चल ही जाएगा ...
दर्द ही दवा होता है हर मर्ज़ का 
लेकिन उस पर लिखे हुए दर्द के लेबल देखकर 
हम इंसान है की डर जाते है ....
एक घूंट पीकर देखो 
तो खुद ब खुद हज़म हो जाता है ....
कुछ ना हो तो अकेले में खारे पानी को बह जाने दो ....कनारे तोड़ कर ....

उस सपने को

बस एक नया जहाँ आवाज देकर छुप जाता है ,
बस यूँही बैठे बैठे कुछ सपने दे जाता है .....
बस इस मुठ्ठीमें कैद कर लेना है उसे आज 
उस सपने को कागज़ पर सजा कर तो देखे !!!!

7 अक्तूबर 2011

मेरे मिलनेकी जुत्सजू ना कर

मेरे मिलनेकी जुत्सजू ना कर 
मैं तो हवामें घुली हुई हूँ हर सांस के पहर ....
मेरी चाहतकी आरजू ना कर 
दिलोंकी चारदीवारी मुझे रास नहीं आती ....
मुझे सपनोंमें बुलानेकी गुस्ताखियाँ ना कर 
बहुत फासले है तुमसे मुझ तकके दरम्यां .....
मुझे तेरी नज्मोंमें बयाँ ना कर इस कदर 
तेरे हर अल्फाज़ पुरे फिर भी अधूरी सी रह जाती  हूँ ....
मेरी तारीफोंके कसीदे ना पढ़ कभी 
इस नाचीज़ को रुसवाई नागवारा गुजरेगी बेरहम दुनियामें ...
तेरी हर यादमें तेरी हर सोचमे हर नफ़समें 
तेरा वजूद कर रहा है बयाँ मुझे ही हर पल पर लिखे सफे पर 
मुझे खुदा समजकर अपना बंदगी ना कर एय बेखबर 
खुशनसीबी तो मेरी है की एक दुआ से तुम मुझे मिल गए ........

ख़ामोशी को समजो....

आज मेरी ख़ामोशी को समजो,
आज मेरी तन्हाई को समजो ,
आज मुझसे ज्यादा तुम खुद को समजो ...
देखो मैं तुम्हारे खयालोमें हरदम हूँ तुम्हारे साथ ही ,
बस आँखें बंद करके तुम खुदमे समाई हुई मुझको समजो .....

6 अक्तूबर 2011

बस यूँही अचानक !!!!

क्यों एक अधूरी तस्वीरसी बन जाती है जिंदगी ,
बैठे हो जब लहराती बहारोंके बीच 
फिर भी वो अचानक वो बंज़रसी नज़र आती है 
 फूलोंके कारवां के बीच ???? बस यूँही अचानक !!!!

5 अक्तूबर 2011

वो लम्हे ...कसमसे ...

बेइंतेहा तन्हाईके आलममें 
एक जुगनू से तुम आये क्यों ???
बस लगा रातकी काली चद्दर पर 
किसीने एक सितारा टांक दिया .....
बस खुदके कदमोकी चाप सुनाई देती थी ,
वो आवाज़ भी कुछ बेगानीसी लगने लगी थी ...
कदमोंके निशाँ मेरे वो रिमज़िमसी 
ओसकी बुँदे मिटाए जा रही थी ....
भीगे भीगे लम्हे 
रातके उस काले सफे पर 
बरबस एक नज़्म गुनगुना रहे थे ....
सितारोंके हुजूम भी हामी भरकर सर हिलाते थे ......
बस वो सरगोशी तुमसे खयालोमें 
वो लम्हे ...
उन लम्होंमें तुम बहुत याद आये ...
कसमसे ...

4 अक्तूबर 2011

मैंने कुछ कहा नहीं ,

मैंने कुछ कहा नहीं ,
कहना चाहती भी नहीं ....
फिर भी निगोड़ी आंखे कहना मानती ही नहीं ,
बस दिलके हर सफे को खोलती रही है ......
आँख राज़ बयां करे वो नहीं चाह कभी ,
पलकोंको ढंककर पर्दा कर लिया ....
बस एक मुस्कराहट थी उनके चेहरे पर 
मेरी हर नाकाम कोशिश के लिए 
जो इश्क के इज़हार को छुपाने के लिए की मैंने .....

3 अक्तूबर 2011

शायद जिंदगी छू कर चली गयी ........

कभी कभी जिंदगीसे प्यार करने की वजह नहीं होती ,
फिर अचानक जिंदगीसे क्यों प्यार हो जाता है ....
बस यही जद्दोजहदसे गुजर रही हूँ आजकल ....यहाँ पर नवरात्री महोत्सव अपने पुरे शबाब पर है ...और एक बड़ा गरबा मेरे घर के ठीक सामने हो रहा है .....शनिवार शाम मेरे घर पर मेहमान इस गरबे में हिस्सा लेने आये ....मेरे परिवार के सदस्य ही ....मम्मी को गरबा खेलना बहुत अच्छा लगता है और बेटी को नहीं खेलना था ...मेरी बेटी बहुत शौक़ीन है और मैं खेलती ही नहीं ...मैं और उस बेटी के साथ और उसकी मम्मी मेरी बेटी के साथ ...दोनों तैयार हुए ...तो एक लम्बा फोटो सेशन किया ...एकदम क्रेजी सा ....मैंने उनकी बेटी के साथ खिंचवाए और उन्होंने मेरी बेटीके साथ ...फिर दोनों खेलने चले गए और हम दोनों सामने फ्लेट के चौथी मंजिल के फ्लोर पर टेरेस में ...लगता था आय एम् ओन ध टॉप ऑफ़ ध  वर्ल्ड ....नीचे सितारे जमीं पर लगते थे ...खूब लोगों का जमघट ...और ऊपर एक तन्हाई ....शायद जिंदगी छू कर चली गयी ........
कल वैसे नियमानुसार देवीके मंदिर पैदल गयी ...वहां एक चारेक साल की बच्ची ...खूब सुन्दर गोरी ,नीली आँखे , मम्मी की तरह जैसे बड़ी औरतें पहनती है सलीकेबंद साडी पहनकर आई थी ...इतनी इतराकर चल रही थी ...मुझे हंसी आ गयी ...मैंने उसे पीछे से पुकारा ...मेडम ,गुड इवनिंग ....वो इतना खुबसूरत हंस पड़ी ..और जवाब दिया ...उसकी मम्मी से पूछा ..तो कहा ऐसी साड़ी सिलवाई है .....वो भी खुश हो गयी ...फिर एक बार निकलते वक्त मुझे वो मिल गयी ...मैंने कहा : बाय बाय मेडम !!! तो हँसके बाय बाय भी कहा ...नाम पूछा तो कहा श्रध्दा ......हाँ ...श्रध्दा  भगवानमें ...शक्ति में ...एक अनजान रिश्ते में ...एक बेनामी  के रिश्तेमें झलकते  सच्चे प्यारे में ...एक अनछुए एहसास में ...दो पलकी सच्ची ख़ुशी में ....
लगा जिंदगी मुझे छूकर निकल गयी ...श्रध्दा के रूप में ...पता नहीं फिर मुलाकात होगी भी या नहीं पर मेरे मस्तिष्कमें तो ये ताज़ा फूल की तरह याद रह जायेगी ...
बाय श्रध्दा .......

2 अक्तूबर 2011

मैं एक दिनके लिए गाँधी बन जाऊं ...

आज गाँधी फिर दुनियाकी सैर को आये है ,
मैं एक दिनके लिए गाँधी बन जाऊं ...
कैसे जीते होंगे वो उस बात का एहसास कर लूँ ....
खूब बुरी भली कही थी उसने मुझको
सो न पाया उस गलत इलज़ामसे मैं  कल रात ...
आज मुझे वो कह रहे है एक शुभ प्रभात ....
एक सच बोला .....
मुझे तुम्हारी सूरतसे भी नफ़रत है ,
है तू  सेठका साला इस लिए तो बोस है .....
शाम को .....
इस्तीफा लिखवा लिया सेठने मुझसे 
ऐसा हश्र हुआ , क्यों की मैं सच बोला ........
बीवीने बोला था शाम पिताजी से मिल आना .
फिर सच बोला ...
न मैं तुम्हारे पिताजीसे मिलने जा पाया ,
आज तो मैं दुसरे शो में पिक्चर देखकर आया .....
अब ....
बीवी रूठकर बैठी है शाम खाना नहीं मिला ...
देखो सच बोलने का एक परिणाम मुझे मिला ....
माँ के ऐनक टूट गए थे कई बार याद दिलवाया था ,
कल सुबह मैं पैसे लेकर तो गया था ....
बीवीकी सालगिरह पर उसके लिए साडी लेकर आया था ....
अब .....
माने मुझे जोरू का गुलाम बताया ...
माँ के पास तो और तीन ऐनक थे ,
बीवी के लिए तो पांच साल के बाद नयी साडी ला पाया था .....
लगता है कल इस गाँधी को खुदसे बिदा कर दूंगा ...
ये छोटीसी दुनियाके लिए फिर सफ़ेद जूठ बोलता जाऊँगा ....
क्योंकि  मैं गाँधी नहीं , मैं एक प्रवर्तमान राजनेता भी नहीं ...
मैं तो हूँ एक अदना इंसान जो छोटी ख़ुशीके लिए जूठ बोल रहा .......

1 अक्तूबर 2011

एक बूंद एक अल्फाज़ ...

एक बूंद एक अल्फाज़ ...
एक प्रवाह जब एक पंक्ति बहे कलमसे ,
क्या कहूँगी कविता को ???
एक नदी ,एक झरना या एक सागर 
सारी अनुभूतियोंका सैलाब खुदमें समेटे जो ???
मैं बहने लगती हूँ कलमके जरिये 
फिर भी कुछ अटकता है दिलकी दहलीज पर आकर 
एक पल लगता है की सब कुछ बह तो गया ...
फिर आँखे मूंदकर देखती हूँ तो 
भीतर अभी भी एक सागर उमड़ रहा है .....
मैं जिन्दा हूँ इसका एहसास तो है ,
फिर भी जैसे क्यों लगता है ,
खुद का जनाजा खुदके कंधो पर लादकर 
कारवां जिसमे कोई नहीं मेरे सिवा 
कौनसी मंजिलके और जा रहा है ....
जिंदगी किस खोज में है .....
जवाब दुनियासे कहाँ मिलेगा ???
खुद के भीतरमें है ...निगाहें देखती है भले दुनिया 
बस खुदमें एक नज़र तो नहीं ??!!!