30 सितंबर 2011

हर करवट हर सिलवट

हर करवट हर  सिलवट एक लकीर खींचती है ,
वक्तके वो आयने होते है ....
कुछ गहरी कुछ उभरी वो कहीं एहसासोंके 
दायरे होते है ....
ये दायरे एक जंजीर बन जाते है 
जकडकर रखी एक सोच उसमे कैद रह जाती है ....
ये गुजरे हुए वक्त के आयने दर आयने 
अक्स बदलते रहते है खुद के ....
वो आयने के बाजु में एक खिड़की भी होती है ....
बस आयनेसे नज़र उठाकर खिड़कीके बाहर झाँख लो जरा ....
वो करवट ,वो सिलवट वो लकीरें 
उसके आगे एक असीम आसमान  नज़र आएगा ....
आने वाले वक्त की सरहद के पार 
सूरज शमा बनकर उजागर होता नज़र आएगा ....

29 सितंबर 2011

बस एक पल अपने लिए ...

बस एक पल अपने लिए ....
जिंदगीसे चुराना मेरे लिए मुश्किल जरुर हो जाता है कभी कभार पर नामुमकिन कुछ भी नहीं ...और खुद पर और परमशक्ति पर श्रध्दा हो तो कुछ भी हो सकता है ..कल इस बात की अनुभूति भी हो गयी ....
पिछले दस सालसे नवरात्रीके दिनोंमें गायत्री माँ के अनुष्ठान और सुबहमें बहुचराजी देवी के दर्शन करने जाना मेरा अटूट नियम था ...पर इस साल मेरी तबियत कुछ ज्यादा ही नासाज़ रहने लगी ....मैं कुछ भी नहीं कर पायी इसी ख्यालसे मुझे बेवजह रोना आ गया ....
पिछले साल तो मंदिर तक पैदल जाकर आने का संकल्प लिया था और पूरा भी किया था ...पर काफी कमजोरी के कारण इस साल मेरी हिम्मत ही नहीं हुई ...पुरे दिन सोचने के बाद ...शक्ति की तस्वीर के आगे बस इतना ही कहा : माँ मैंने क्या गुनाह किया ?? क्यों तू मुझे नहीं बुलाती ???
शाम को बस तैयार होकर पैदल निकल गयी ...पति देव को फोन किया आप उधर रहे ताकि मैं आपके साथ लौट सकू ....मेरे पडोसी ने मुझे टोका भी : अरे आज तो आप नयी साडी पहनकर जा रहे हो ???
तो मैंने कहा : देखो बहनजी ,हम किसी फंक्शन पर जाते है तो पार्टी के लिए तैयार होते है और ये तो खुद माँ शक्ति का उत्सव है तो क्यों नहीं ??? और मैं गयी ,दर्शन करते हुए आँखोंमें आंसू थे ....
मेरे सहेली ने रात गरबा वक्त मुझे कहा : कल सुबह मेरे साथ आना स्कूटर पर चलेंगे .......
कहते है भगवान परीक्षा लेते है और रस्ते भी खुद ही दिखाते है ........
मैं गरबे तो नहीं खेलती पर सामने देखने जरुर जाती हु ...हमारे फ्लेट का एक छोटा सा बच्चा तक़रीबन एक सवा साल का ...निसर्ग ...बहुत ही चंचल ....कल कम्पाउंडमें उसके साथ खेलने का बहुत ही मजा आया ...मैं छुप जाती और वो मुझे ढूँढने आता ...सब औरतें गोसिप कर रही थी तब मुझे उसके साथ खेलने में मज़ा आ रहा था ....दोनों घर जाते वक्त तो दोस्त बन गए ....
कहते है बच्चे में भगवान होता है ...और भगवानको अपने हर बच्चे की चिंता भी होती है ....
बस एक चीज लगी की आप अपने आप को जब भी कभी भी बहुत मजबूर समजो एक बार ऊपरवाले को याद कर लेना हिम्मत अपने आप आ ही जाती है .....
जय माता दी ....

26 सितंबर 2011

तो समजो प्यार है ....

जरासी आहटसे  धडकता है दिल 
तो समजो प्यार है ,
आँखोंमें इंतजारकी लाली है 
तो समजो प्यार है 
कहीं दिल न लगे और खुद में हो जाए गम 
तो समजो प्यार है 
आयने में अक्स अपना नहीं लगे 
तो समजो प्यार है 
अपनी तस्वीरमें उसकी तस्वीर नज़र आने लगे 
तो समजो प्यार है 
उसके आने पर नज़र झुक जाए 
तो समजो प्यार है 
होठोंसे नहीं बातें जब नज़रोंसे बयां हो जाए 
तो समजो प्यार है ....
एक नज़रमें किया उनका इज़हार जब इकरार कहलाये 
तो समजो प्यार है .....

23 सितंबर 2011

वक्त

कारखानोंसे वक्त काला धुआं निकलता है ,
वक्त कभी भूखे बच्चेकी आहोंमे रोता है 
वक्त कभी सड़कके किनारे ठण्डमें ठिठुरता है 
वक्त का बदन कभी कड़ी धुपमें  जल जाता है 
वक्त कभी बूढी माँ की आहोंमें सिसकता है 
वक्त कभी प्यारकी आँखोंसे दर्द बनकर अश्क बन बहता है 
वक्त कभी मुडकर देखता नहीं पीछे 
देख भी लेता तो हर निशान नज़र आ जाते है जो उसने बनाये 
तो .....
वक्त कभी महबूबाकी मेहंदीका रंग बन खिलता है 
वक्त कभी दो दिलोंकी ख़ामोशीमें इश्कके सुर भी सुनता है 
वक्त कभी पढने जाता है युनिफोर्म पहनकर स्कुलमें 
वक्त कभी घोड़ी चढ़कर दुल्हन लेकर आता है 
वक्त हांफ जाता है पुराने अफसानों पर जवानी के हँसते हुए 
वक्त धुंधली आँखों पर चश्मा लगाकर दूर कुछ ताकता है ...
फिर भी 
ये वक्त ही है हर वक्त करवटें बदलता हुआ 
रुख जिंदगीके पलटता हुआ 
एक सिरे से चलता हुआ जब दुसरे छोर पर पहुँचता है 
तो एक नामकी शख्शियत के नाम जिंदगी की पहचान बन जाता है .....

मिटटीकी दीवारोंसे

गुलदस्तेमें हँसते हुए फूलोंने 
शिकायत कर दी मुझसे 
डालीसे बिछड़कर हमारे 
आंसू ही खुशबू बनकर बिखर गए फिजाओंमें ....
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इस मिटटीकी दीवारोंसे 
उखड़ती हुई परतोंके नीचेसे
दिख रहे थे कंकाल वहां पर गुजरे हुए कल के 
खंडहरसा ये कुछ कल एक घर था हँसता हुआ .....

22 सितंबर 2011

फाड़कर फेंक दिया एक कागजका टुकड़ा

फाड़कर फेंक दिया एक कागजका टुकड़ा 
जिस पर नाम लिखा था किसीका ,
वो महज नाम नहीं था एक वजूद था जिन्दा ,
एक वजूद जिन्दा एक नाम बनकर उभरता था ...
फाड़ कर फेंक दिया कागजका टुकड़ा ,
फिर भी वजूद क्या फेंक पाया कोई ,
नाम मिटा दिया हथेली पर 
स्पर्श कहाँ मिटा पाया ...
नाम मिटा दिया उस गली का जहाँ घर था उसका ,
दिलमें फिर धड़कन उठी उसको याद करके उसे कौन झुठला पाया ???
आँखें मूंद ली जब तस्वीर नज़र आई 
पर उसकी आवाज कहाँ मिटा पाया ???
एक नाम सिर्फ एक नाम नहीं होता दोस्त जिसे फाड़ कर फेंक दो ,
वो तो दोस्ती होती है वो तो दोस्त होता है ,
जब पास हो तो सारी बलाएँ ले ले तुम्हारी ,
जब उसे निकाल दिया अपनी गली से 
उसके बाद ही बहुत याद आता है ...
उसके बाद ही आंसू बनकर बहता जाता है ....
वो आवाज ,वो दोस्त और नहीं बस निकाल दो दिलसे ,
पर ये किसीके बस का नहीं ,वो और करीब हो जाएगा ....

21 सितंबर 2011

खिड़की का कांच

मेरे घरकी एक खिड़की का कांच आज टूट गया ,
कोई बहती हवा का झोका बिन पूछे आ गया ....
लिख कर लाया था वो मेरे वतनका एक पैगाम ,
चल एक बार फिर वतन को हो आये .....
आती हवाओंने दिया है न्यौता वतनकी सफरका 
दीवालीकी खुशबू फिर गूंज रही है जहनके जहानोमे ......

20 सितंबर 2011

सरक गए गुलाबकी खुशबू

आज अलमारी बोल पड़ी 
उस पर रखी एक संदूकने पुकारा मुझे ...
मेरा एक अस्तित्व सालों के बाद 
उस संदूकसे बाहर आने लगा ....
वो जेवर ,वो मूंदे कानोंके ,
वो पहेली कक्षाकी तस्वीर स्कुलकी ,
वो पहली डायरी ,
वो पहली डायरी ,वो पहली शायरी ,वो पहली कविता .....
वो कंगन ,वो कलम ,वो शंखकी माला ,
वो पत्थर ,गित्ते ...
वो आल्बम तस्वीरोंके जमघटसा ,
जहाँ पर हर पन्ना पल्टाते हुए 
पीछेसे आगे तलक 
मेरी उम्र हर लम्हा घटती जाती थी ...
जब वो आगे से पीछे जाते थे 
हर लम्हा मेरी जिंदगीमें मुझे 
बड़ा कर रहा था ....
पर मेरे आज तक न छू पाता  था ....
छोटी फ्रोकसे साडी तक का सफ़र था वो ....
सबसे नीचे रखी हुई वो ग़ालिब की नज्मोंकी किताब 
बड़ी ही नजाकतसे उठाई ....
एक सूखे हुआ गुलाब सरक आया ,
कुछ लिखा हुआ एक कागजका टुकड़ा सरक आया ,
हमारे इश्ककी पहली सालगिरहकी यादें समेटकर 
सरक गए सूखे हुए  गुलाबकी खुशबू 
अभी तक वो सफे पर रुकी थी ...
पहले प्यार का एहसास बिखेरे हुए .....

19 सितंबर 2011

एक क़र्ज़ है ....

आंसू तो पलकों पर रखा एक क़र्ज़ है ,
मुस्कान तो होठोंका एक फ़र्ज़ है ...
पलकों पर सारे दर्दके नमकको खुदमें घोल 
ये अश्क नमकीन बन जाते है ....
दिलकी दीवारोंको तोड़कर हर ख़ुशी 
होठों पर मुस्कान बनकर जच जाती है ....
आंसू के बगैर अधूरीसी लगती है हर आँख 
होठोंकी सुन्दरता भी कभी पूरी है मुस्कानोंके सिवा ???
मुस्कान तो हर होठका शृंगार है ,
उससे बिखरती हुई हंसी तो एक चेहरे की जान है ....
अश्कके बगैरह लगती अधूरी हर आँख है ,
ये तो दिल के दर्पणको साफ़ करनेकी एक दवा है ....
मेरे होठोंकी मुस्कराहटकी वजह था कोई ,
हमें बेवफा समजकर पलकों पर अश्क दे गया कोई ......

18 सितंबर 2011

सपने भी पाँवमें पायल पहनकर आते है ,

आजकल सपने भी पाँवमें पायल पहनकर आते है ,
जब लिपटकर हम सोते है नींदकी चादरसे ...
अपनी खनकसे जगाकर चले जाते है हरदम ...
नाचती हुई पलकोंसे वो ताल मिलाते है ,
हमारे सोये हुए कुछ अरमानोको जगाकर चले जाते है .....
कहते है सयाने कभी सपनोंको मरने नहीं देना ,
सपने ही सच होने को देखते है एक सुनहरे दिन का रास्ता .......
तब मैंने आज रात कहा मेरे सपने को 
थोड़ी सी ख़ामोशी भी दे दिया करो मुझे तन्हाईमें जीने दो ....
बड़ी मुद्दत के बाद आज जमीं परसे चाँद नज़र आया है ,
चंद लम्हे उनसे भी तो गुफ्तगू करने दो .......
चाँद बहुत बुरा मानता है जब उससे कुछ बात नहीं करती ,
भाग जाता है मुझसे दूर कहीं 
अमावस बनकर खिजाते हुए ....
आज चाँद रात भी है ...
बादलोंसे निकला हुआ चाँद भी है ...
तुमने तोड़ी है नींदे मेरी पायलकी झंकारसे ...
हरजाना देना पड़ेगा मुझे इस बात के लिए 
आज रात सिर्फ चाँद के नाम होगी ....

17 सितंबर 2011

आजकल ......

आजकल धूप भी टुकड़ोमें बिखरकर मिलती है ,
जैसे वो जिंदगीकी हमशक्ल होने के दावे करती है ...
जब किसीको मिलने को दिल तड़प जाता है ,
उसे ही वो आपकी जिंदगीसे गायब कर देती है ....
शायद इसे जिंदगी का षड्यंत्र समजने की भूल हो गयी ,
एय जिंदगी तुने तो मुझे किसीके बगैर भी जीना सिखा दिया है ...
किसीका एहसान है इस जिंदगी पर उसे चुकाना जब चाहा
 उसी इंसानको नहीं पाया तब किसी अनजानको मदद करके भूल गए है .... 

16 सितंबर 2011

बचपन

मेरी एक मासूम दुआ जो कुबूल हो गयी ,
लगा खुदाने मेरा वजूद कुबूल किया ....
अय खुदा आज तेरे सज़देमें झुका दिया मैंने अपना गुमाँ.....
बस मेरा कोई अपना मेरा कोई खास 
दूर दूर परदेससे जिसने मुझे बड़ी शिद्दतसे याद किया ...
क्या बताऊँ किसीको वो लम्हे
 जिसमे रातकी सितारोंकी  रौशनीमें 
मैंने अपना पूरा बचपन खूब जी लिया ....

15 सितंबर 2011

ओसमें लिपटी...???!!




एक अकेलापन एक अधूरापन ,
खुदमें पूरा लगा है कभी ???
फिर भी गौरसे देखा उसे जब 
मैंने महसूस किया जब 
खुदसे अलग ,खुदसे जुदा .....
एक नए रूपमें 
बिलकुल पाक फ़रिश्तेकी तरह 
लिपटा हुआ जो सफ़ेद लिबासमें .....
लगा बेइख्तियार सा ही सही पर 
 वो जरुरी है मेरे लिए 
मेरा अकेलापन 
क्योंकि वहांसे जुड़े मेरे जज्बात 
अक्सर अल्फाजोंके लिबास पहनकर 
बाहर आते है तो कभी पुकार लेते ही बेखुदीमें 
शायरी कहकर या फिर ओसमें लिपटी एक नज़्म ....

14 सितंबर 2011

अन्दाजें बयां

उनकी  चाहतोंका रहा अन्दाजें बयां कुछ और ही ,
बस हम बोलते रहे और वो सुनते रहे आँखों से .....
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रस्तेके हर पत्थर पर उनका नाम लिखता चला गया ,
पत्थर ख़त्म हो गए और हसरत अधूरीसी रहने लगी ....
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इश्कके मायने पढने पढ़ ली हर किताब जिसमे ये शब्द महफूज़ लगा ,
और वक्त कुछ यूँ जाया कर लिया हमने की इश्क करना ही बाकी रह गया ...

13 सितंबर 2011

जीने की वजह

कुछ कहनेके लिए जब लब्ज़ थरथराते है ,
तब कभी शब्द साथ छोड़ जाते है .......
अनकही दास्ताने अधूरीसी लगती हो कभी
तो आँखें भी अफ़साने कह जाती है......
दास्तानें जो नहीं लिखी गयी किताबोंमें 
कैद होकर किसीके दिलमें भी रह जाती है......
ना कह पाने की क्या मज़बूरी थी क्या पता ????
बस ये किस्से किसीके जीने की वजह बन जाते है.............

12 सितंबर 2011

धूपका कोना....

खुशबू को कैद करके एक बोतलमें 
फूलोंको तडपता छोड़ दिया क्यों ?
वो फूलोंकी लाश पर देखो 
इन्सानोके काफिले जा रहे है !!!!
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धूपका कोना नज़र आता है
एक गहरी काली रातमे 
जो दिनका महोरा पहेनकर आया था 
जब बुझ गयी शमा तो ख्याल आया
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क़दमोंके निशानमें एक शक्ल नज़र आई 
पुराने संदूकमें जैसे ताज़ातरीन नज़्म लिखी नज़र आई

10 सितंबर 2011

एक खाली पन्ना था ....

मेरी डायरीका वो पन्ना ...
उस पर मैंने हिसाब लिखा था मेरी ख़ुशी का ...
उस पर याद करके लिखे थे उनके नाम
जिसने मेरी जिंदगीका ख़ुशीका तार्रुफ़ करवाया था ....
बस उनके नाम मैंने नहीं लिखे
जिसने मुझे गमका मतलब समजाया.....
क्योंकि ये मेरी चाहत थी
जब ये डायरीका पन्ना खोलूं
तब मेरी ख़ुशीके सारे वजूद और कारण
मुझे इधर हँसते हुए मिल जाए ...
गम कोसो दूर रहे .......
आज मेरा वो पन्ना हवाकी एक लहरके साथ
खुली खिड़कीसे उड़कर कहीं बहकर उड़ गया .....
एक पल ...
एक पल तो लगा यूँ की
वो मेरी सारी खुशियाँ लेकर चला गया ........
पर उसके बाद एक खाली पन्ना था ....
मैंने उस पर एक नयी नज़्म लिखनी शुरू कर दी .......
उस उड़ गए पन्ने के नाम ....

9 सितंबर 2011

वेकेशन मनाने के लिए ....

मेरी मुस्काने अब आयनेके अक्सकी तरह है ,
एक आभास होता है हंसी का
पर छूकर देखो तो बेरूख होकर होती गायब है
जैसे उसकी हस्ती हो ही नहीं ......
मुझे पूछते है लोग कहाँ गयी वो मुस्कुराहटें ???
कह देती हूँ वो भी थक गयी थी ...
गयी है कहीं दूर वेकेशन मनाने के लिए ....

8 सितंबर 2011

एक राह

एक राह तनहासी कभी क्यों नहीं लगती ?
क्योंकि उसे तन्हाईके मायने नहीं मालूम ....
एक दरख़्तको एक जगहकी मायूसी क्यों नहीं होती ??
क्योंकि उड़नेकी ख्वाहिशें पालते परिंदों का भी वो आशियाना है ....
एक फूलको क्यों ख़ामोशीसे परहेज नहीं होता ???
महकाती हो जब गुलशनको उसकी खुशबूएं खामोश रहकर भी .....
रस्ते क्यों तनहा नहीं रहते ???
मंजिलोंके राहों पर चलनेवालोके वो साथी जो बन जाते है ........

7 सितंबर 2011

ढलती सांजसे..


ढलती सांजसे नींदसे जागती सहर तक
रात अपना दामन फैलाकर चली आती है ...
उजालोंको अपने दामनमें गहरी नींद सुलाती है
नींदका कहाँ वास्ता होता है इन गहरी काली रातोंसे ??
सपनोमें देखी हर दास्ताँ नींद रातको सुनाती है ....
और रातकी खुबसूरत चेहरेको देखने के लिए ,
चाँद सितारे रोशन होकर उसे उजागर करते है .......

6 सितंबर 2011

न ..न ...

एय बदरा...
मैंने तेरा इंतज़ार किया था बेकरारीसे
और तुम आनेमें देर लगा रहे थे !!!!
अबके आये ऐसे की जैसे
रुक जानेके इरादे है तुम्हारे उम्र भर ????
न ..न ...
सूरजकी रोशनीके बगैर बुझी बुझी लगे है अब जिंदगी ...
चांदनीके बगैर वीरानीसी है मेरी हर रात ....
सितारोंसे भी एक युग गुजरा जैसे
जब मैंने करी थी उनसे दिल की बात !!!!!
न ...न ...
तुम्हारी नाराज़गी सिर्फ मुझसे है जानती हूँ ....
हर सालकी तरह मैं न तुमसे मिलने आई ..
छत पर हम भीगते रहते थे बनकर यूँ मगन ...
छाता लेकर दूर तक पैदल चलना मेरा तनहा तनहा ...
बुन्दोंसे बातें करते हुई नज्मोंमें कहना फ़साना मेरा .....
न ..न ...
वो मेरी छोटीसी स्कूटी थी ..जिस पर सवार हो
मैं अकेली अकेली बहुत दूर तक तुम संग चली थी ....
न छाता दरम्यां था न रेनकोटमें खुद को समेटा था ....
वो बुन्दोकी बातें को तरस गए हो ?? या मेरे दीदार को रुक गए हो ???
न....न ....
मेरे सूरज को मेरे पास लेकर आओ ....
मेरी मजबूरीको समजकर अब तो लौट जाओ ....

5 सितंबर 2011

आज शिक्षक दिवस है .....

आज शिक्षक दिवस है .....
आज मैं ये लिख सकती हूँ और आप ये पढ़ सकते है इसके लिए जिस व्यक्तिके हमें शुक्रगुजार होना चाहिए वो व्यक्ति .....
मेरी पाठशालाके प्रधानाचार्य जो एक महिला थे उनसे मुझे बहुत डर लगता था ...उनकी आभा ही कुछ इस तरह की थी ....लेकिन कहीं न कहीं उनके जितने ज्ञानी होने की आशा थी ....मेरी पहली टीचर पहली कक्षाके थे श्रीमती भारतीबेन .....मुझे क ख ग सिखाया .....लेकिन मुझे श्रीमती अनुमतिबेन आचार्य बहुत पसंद थे और आज भी है ....
पिछले माह हमारे प्रधानाचार्यश्री की ७५ वी वर्षगांठ पर अपने सारे पुराने विद्यार्थियोंको किसी भी तरह से कोंटेक्ट करके आमंत्रित किया ....लगभग दो सौ जितने विद्यार्थी उपस्थित रहे ....लगभग इकत्तीस साल के बाद उसी प्रार्थनासभा के होल में उसी माइक पर मैंने फिर सबको संबोधित किया जहांसे लगभग अंतिम छ साल तक मैं समाचार पढ़ती थी , स्पर्धामें हिस्सा लेकर गीत भजन गाती थी और वक्तृत्व स्पर्धा में सबकी तालियाँ बटोरती थी ...मेरे कुछ शिक्षक अब इस दुनियामें नहीं थे ...और कुछ थे जो बहुत ही वयस्क थे ...जो शिक्षकोंने मुझे पढाया था वो सब मेरे खड़े होते ही बोल उठे अरे ये तो प्रीति गोहिल ( मेरा शादी के पहले वाला नाम ) है ...मेरे साथ पहली कक्षा से पढ़े लगभग हम दस विद्यार्थी थे ...वो सभी मुझे तुरंत पहचान गए .......हमने अपनी यादें बांटी.......
मैं कह सकती हूँ की मेरी जिंदगी के जो सबसे अच्छे साल थे वो उस पाठशालाके आँगनमें आज भी अंकित है ....और उस वक्त ये पता नहीं था की ये वक्त दोबारा नहीं आएगा ....आज भी हम सब जब अपने सबसे खुबसूरत पलों को याद करते है तो वो सारे स्कुल से जुड़े होते है ....
और उस स्कुलको जान अगर विद्यार्थी है तो शिक्षक उसकी आत्मा है ....
आज सारे शिक्षकों को मेरी और से शिक्षक दिवस मुबारक हो ......

3 सितंबर 2011

चाहत है ...!!

कहीं दूर जानेकी चाहत है
पर कदम रुक रहे है यूँ कुछ ...
डर नहीं अनजान राहोंका फिर भी
राह पर चलते अनजान फ़ासलोंका ख्याल है ......
मुझे काफिलोंकी चाहत नहीं है ,
बस एक हमसफ़र ही काफी है ....
चुपचाप चलते हुए ...
बस जहाँ साँसोंकी आवाज सुनाई दे
वो ख़ामोशी की सदा है ....
पंछियोंके परवाजों  की भी आहट सुनने की ख्वाहिश है ...
पत्तीकी सरसराहट भी नज़्म बनकर
लिख जाए एक दास्ताँ राह पर ....
वो राह पर लिखी दास्ताँ राहबर बन जाए ....
आज शायद तनहा हो जो भी
कल उनके लिए हमसफ़र बन जाए ....
एक कदम ...एक आरजू..एक कशिश .......
एक दूर चले जाने की ख्वाहिश .......
अब ये दुनिया की महफ़िलसे दूर ....

2 सितंबर 2011

अजनबी फिर भी मुझे

आजकल चेहरे बदल दिए है आयनोने,
मेरा अक्स मुझसे हंसकर मिल रहा है ....
भरम है ये मेरी नज़रोका मेरी ये मुस्कुराती हुई तस्वीर
या आजकल ये दिल का मौसम कुछ बदला बदलासा है !!!!!!
कोरे कागज़ रख छोड़े थे रात पर मेज पर
कौन उस पर मुझे ही एक नज़्म बनाकर अल्फाजोंमें कैद कर गया ????
खुली खिड़कीके उस पार एक घना दरख़्त है
कौन हर पत्ते हर शाख पार मेरी तस्वीर बनाकर छोड़ गया है ????
खुले आकाशके बिखरे हुए बादलोंमें
एहसासकी बूंदोंकी नमी को सहेज कौन मुझ पर बरस गया है ????
एय अजनबी !!! आवाज देकर मुझे अपना नाम तो बता जाओ !!!
हो तो अजनबी फिर भी मुझे अपने से लगते जाते हो .....

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...